मैं आपका नौकर हूं, बैंगन का नहीं (Akbar-Birbal)

एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। फले-फूले बाग को देखकर बादशाह अकबर बहुत खुश थे। वे बीरबल से बोले, ‘बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!’ इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं। हां! महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह […]

विद्वत्ता का घमंड

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था I शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था Ι अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया Ι उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा Ι उनसे बड़ा […]

आखिरी मंजिल….प्रेमचंद (Akhari Manzil by Premchand)

आह ? आज तीन साल गुजर गए, यही मकान है, यही बाग है, यही गंगा का किनारा, यही संगमरमर का हौज। यही मैं हूँ और यही दरोदीवार। मगर इन चीजों से दिल पर कोई असर नहीं होता। वह नशा जो गंगा की सुहानी और हवा के दिलकश झौंकों से दिल पर छा जाता था। उस […]