सही-ग़लत(Sahi Galat Hindi Poem)

सही-ग़लत(Sahi Galat Hindi Poem)

 

रात के अँधेरे में अगर तुम,

चेहरा ढक कर निकलोगे तो

तुम्हे लोग पहचान लेंगे,

तुम्हारी नियत जान लेंगे ।।

तुम सही नहीं हो

तुम जरुर सही नहीं हो

तुम ग़लत हो या

ग़लत करने जा रहे हो  ।।

तूने ऐसा क्या किया, कि

 अपना चेरा ढक लिया ?

चोरी की या डकैती की

खून किया या किसी की

इज्जत लूट ली  ?

आखिर कौन सा

ऐसा काम किया, कि

तूने अँधेरे में भी

 आपना चेहरा ढक लिया  ?

२.

तुम सही नहीं हो

तुम जरूर सही नहीं हो ।।

तुम गलत हो,

तुम ग़लत ही हो ।।

सही आदमी को कैसा डर,

क्यों छुपाये चेहरा या सर ।।

ये तो चलते है अपने पथ पर

होके निडर …

अँधेरा हो रात का..या हो दिन दोपहर  ।।

फ़ासले..(Fasale)

gap

मैंने देखा अज़ीब सी घटना,

जो थी बहुत खास  ।

मानव खा रहे  थे मांस,

व कुत्ते खा रहे  थे घास   ।।

उनके घर के बचे भोजन से ,

आज भी आ रही थी बांस  ।

मेरे घर के बच्चों को छोड़ो ,

चूहें भी है उदास  ।।

वहां होती अतिवृष्टि  से

जीवन त्रास- त्रास   ।

यहाँ फूटी अंख दृष्टि भी-

तक रही आकाश ।।

उनके जनम दिन पर आज-

लुटाये जा रहे वस्त्र खासम – खास   ।

इनके मरण दिन पर आज –

एक कफ़न के लिए भी तरस रही है लाश ।।

 

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Fasale Hindi Poem

माँ का आंचल

 

जब आंख खुली तो अम्‍मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था

उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था

हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया

मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी

उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था

मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी

मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्‍या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है

जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं

मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है

मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है

हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है

मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है

मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्‍य की काया है

मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्‍तों की गहराई है

मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्‍यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है

मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है

माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है

मां सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है

अम्‍मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है

सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं

हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं…

 

maa ka anchal

तनहा ही रह गया

lonely

न मैं स्मार्ट बनने की कोशिश करता हूँ,

और न ही मैं परियों पे मरता हूँ।

वो एक भोली सी लड़की है,

जिसे मैं मोहब्बत करता हूँ।

उसकी तस्वीर मेरी दिलों दिमाग व आखों में बसी है,

मगर ‘हाय’ वो किसी और को दिल दे चुकी है।

अब एक ही बात मुझे खटकती है हर रोज़,

बिना उसके अतीत जाने मैंने उसे आखिर किया ही था क्यों प्रपोज।

लगने से पहले ही उजड़ गई

ये प्यार वाली बगिया,

इस संसार की भरी महफ़िल में

आखिर तनहा ही रह गया ” बेचारा रबिया” ।।

tanaha hi rah gaya

आदमी की औकात (Adami ki Aukat)

एक माचिस की तिल्ली ,
एक घी का लोटा ,
लकड़ियों के ढेर पे
कुछ घण्टे में राख…
बस इतनीसी है
आदमी की औकात ?

एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया ,
अपनी सारी ज़िन्दगी ,
परिवार के नाम कर गया…
कहीं रोने की सुरसुरी ,
तो कहीं फुसफुसाहट ,
अरे जल्दी ले जाओ ,
कौन रोयेगा सारी रात…?
बस इतनीसी है
आदमी की औकात ?

मरने के बाद नीचे देखा ,
नज़ारे नज़र आ रहे थे…
मेरी मौत पे कुछ लोग
ज़बरदस्त , तो कुछ ज़बरदस्ती
रो रहे थे…
नहीं रहा……चला गया…..
ये चार दिन करेंगे बात…
बस इतनीसी है
आदमी की औकात ?

 barbed-wire

बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगा ,
सामने अगरबत्ती जलायेगा ,
खुशबुदार फूलों की माला होगी ,
अखबार में अश्रुभरी श्रद्धांजली होगी…
बाद में उस तस्वीर के
जाले भी कौन करेगा साफ़…?
बस इतनीसी है
आदमी की औकात ?

जिन्दगीभर
मेरा…मेरा…मेरा… किया ,
अपने लिए कम
अपनों के लिए ज्यादा जिया…
कोई न देगा यहां साथ…
जायेगा खाली ही हाथ…
क्या , तिनका ले जाने की भी
है हमारी औकात ???

हम चिंतन करें ,
क्या है हमारी औकात ???
क्या है हमारी औकात ???

स्पस्टीकरण- प्रस्तुत कविता Social Media से लिया गया है और इसके लेखक का नाम ज्ञात नहीं है इस कारण यह रचना  इसके मूल अज्ञात रचनाकार को समर्पित है। UtsavMantra इसपर किसी प्रकार का Copyright का दावा नहीं करता है

adami ki aukat

फिर मनाएगा कौन(Phir Manayega Kaun)

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए
फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है, कल खाई होगी
फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप, तुम भी चुप
इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन ?
बात छोटी सी लगा लोगे दिल से,
तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर,
सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
न मैं राजी, न तुम राजी,
फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी,
तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,
इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन एक ने आँखें….
तो कल इस बात पर फिर
पछतायेगा कौन ?

 flower

कुछ हँस के बोल दिया करो,
कुछ हँस के टाल दिया करो,
यूँ तो बहुत परेशानियां है तुमको भी मुझको भी,
मगर कुछ फैंसले वक्त पे डाल दिया करो,
न जाने कल कोई हंसाने वाला मिले न मिले..
इसलिये आज ही हसरत निकाल लिया करो !!
हमेशा समझौता करना सीखिए..
क्योंकि थोड़ा सा झुक जाना किसी रिश्ते को हमेशा के लिए तोड़ देने से बहुत बेहतर है ।।।
किसी के साथ हँसते-हँसते उतने ही हक से रूठना भी आना चाहिए !
अपनो की आँख का पानी धीरे से पोंछना आना चाहिए !
रिश्तेदारी और दोस्ती में कैसा मान अपमान ?
बस अपनों के दिल मे रहना आना चाहिए…

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Phir manayega kaun

बड़े दिन हो गए

seashell
वो माचिस की सीली डब्बी, वो साँसों में आग,
बरसात में सिगरेट सुलगाये बड़े दिन हो गए।

वो दांतों का पीसना, वो माथे पर बल,
किसी को झूठा गुस्सा दिखाए बड़े दिन हो गए।

एक्शन का जूता और ऊपर फॉर्मल सूट,
बेगानी शादी में दावत उड़ाए बड़े दिन हो गए।

ये बारिशें आजकल रेनकोट में सूख जाती हैं,
सड़कों पर छपाके उड़ाए बड़े दिन हो गए।

अब सारे काम सोच समझ कर करता हूँ ज़िन्दगी में,
वो पहली गेंद पर बढ़कर छक्का लगाये बड़े दिन हो गए।

वो ढ़ाई नंबर का क्वेश्चन, पुतलियों में समझाना,
किसी हसीन चेहरे को नक़ल कराये बड़े दिन हो गए।

जो भी कहना है अब फेसबुक पर डाल देता हूँ,
किसी को चुपके से चिट्ठी पकड़ाए बड़े दिन हो गए।

बड़ा होने का शौक भी बड़ा था बचपन में,
खट्टा मीठा चूरन मुंह में दबाये बड़े दिन हो गए।

मेरे आसमान अब किसी विधवा की साड़ी से लगते हैं,
बादलों में पतंग की झालर लगाए बहुत दिन हो गए।

आजकल खाने में मुझे कुछ भी नापसंद नहीं,
वो मम्मी वाला अचार खाए बड़े दिन हो गए।

सुबह के सारे काम अब रात में ही कर लेता हूँ,
सफ़ेद जूतों पर चाक लगाए बड़े दिन हो गए।

लोग कहते हैं अगला बड़ा सलीकेदार है,
दोस्त के झगडे को अपनी लड़ाई बनाये बड़े दिन हो गए।

साइकिल की सवारी और ऑडी सा टशन,
डंडा पकड़ कर कैंची चलाये बड़े दिन हो गए।

किसी इतवार खाली हो तो आ जाना पुराने अड्डे पर,

   दोस्तों को दिल के शिकवे सुनाये बड़े दिन हो गए……
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bade din ho gaye

आहिस्ता चल जिंदगी

आहिस्ता  चल  जिंदगी,अभी
कई  कर्ज  चुकाना  बाकी  है
कुछ  दर्द  मिटाना   बाकी  है
कुछ   फर्ज निभाना  बाकी है
                   रफ़्तार  में तेरे  चलने से
                   कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
                   रूठों को मनाना बाकी है
                   रोतों को हँसाना बाकी है
कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए
कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए
उन टूटे -छूटे रिश्तों के
जख्मों को मिटाना बाकी है
                    कुछ हसरतें अभी  अधूरी हैं
                    कुछ काम भी और जरूरी हैं
                    जीवन की उलझ  पहेली को
                    पूरा  सुलझाना  बाकी     है
ख्वाहिशे जो घुट गई इस दिल में
उनको दफ़नाना बाकी है
आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी
कई कर्ज चुकाना बाकी    है
                    जब साँसों को थम जाना है
                    फिर क्या खोना ,क्या पाना है
                    पर मन के जिद्दी बच्चे को
                    यह   बात   बताना  बाकी  है
तू आगे चल मैं आता हूँ
क्या छोड़ तुझे जी पाउँगा।
इन साँसों पर हक़ है जिनका
उनको समझाना बाकी है।                  
                   आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी
                   कई कर्ज चुकाना बाकी    है
                   कुछ दर्द मिटाना   बाकी   है   
                   कुछ  फर्ज निभाना बाकी है ।
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Aahista chal zindagi

छोड़िये बीती बातों का गम क्या करे…

flower UtsavMantra

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अपनी आँखों को अब और नम क्या करे
छोड़िये बीती बातों का गम क्या करे।।
 

इसलिए हमने उनका यकीं कर लिया

खा रहे थे क़सम पे क़सम क्या करे।।
 

ये तो सूरज को ख़ुद सोचना चाहिए

धुप में जल रहे थे क़दम क्या करे।।
 

मौत आगे भी है मौत पीछे भी है

अब यही ज़िन्दगी है तो हम क्या करे।।
 

अब आ ही गए बाज़ार में हम भी

अपनी कीमत को अब और कम क्या करे।।
 
अपनी आँखों को अब और नम क्या करे
छोड़िये बीती बातों का गम क्या करे।।
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( chhodiye biti baton ka gum kya kare)