आखिरी मंजिल….प्रेमचंद (Akhari Manzil by Premchand)

आह ? आज तीन साल गुजर गए, यही मकान है, यही बाग है, यही गंगा का किनारा, यही संगमरमर का हौज। यही मैं हूँ और यही दरोदीवार। मगर इन चीजों से दिल पर कोई असर नहीं होता। वह नशा जो गंगा की सुहानी और हवा के दिलकश झौंकों से दिल पर छा जाता था। उस नशे के लिए अब जी तरस-जरस के रह जाता है। अब वह दिल नही रहा। वह युवती जो जिंदगी का सहारा थी अब इस दुनिया में नहीं है।
मोहिनी ने बड़ा आकर्षक रूप पाया था। उसके सौंदर्य में एक आश्चर्यजनक बात थी। उसे प्यार करना मुश्किल था, वह पूजने के योग्य थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक बड़ी लुभावनी आत्मिकता की दीप्ति रहती थी। उसकी आंखे जिनमें लाज और गंभीरता और पवित्रता का नशा था, प्रेम का स्रोत थी। उसकी एक-एक चितवन, एक-एक क्रिया; एक-एक बात उसके ह्रदय की पवित्रता और सच्चाई का असर दिल पर पैदा करती थी। जब वह अपनी शर्मीली आंखों से मेरी ओर ताकती तो उसका आकर्षण और असकी गर्मी मेरे दिल में एक ज्वारभाटा सा पैदा कर देती थी। उसकी आंखों से आत्मिक भावों की किरनें निकलती थीं मगर उसके होठों प्रेम की बानी से अपरिचित थे। उसने कभी इशारे से भी उस अथाह प्रेम को व्यक्त नहीं किया जिसकी लहरों में वह खुद तिनके की तरह बही जाती थी। उसके प्रेम की कोई सीमा न थी। वह प्रेम जिसका लक्ष्य मिलन है, प्रेम नहीं वासना है। मोहिनी का प्रेम वह प्रेम था जो मिलने में भी वियोग के मजे लेता है। मुझे खूब याद है एक बार जब उसी हौज के किनारे चॉँदनी रात में मेरी प्रेम – भरी बातों से विभोर होकर उसने कहा था-आह ! वह आवाज अभी मेरे ह्रदय पर अंकित है, ‘मिलन प्रेम का आदि है अंत नहीं।’ प्रेम की समस्या पर इससे ज्यादा शनदार, इससे ज्यादा ऊंचा ख्याल कभी मेरी नजर में नहीं गुजरा। वह प्रेम जो चितावनो से पैदा होता है और वियोग में भी हरा-भरा रहता है, वह वासना के एक झोंके को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। संभव है कि यह मेरी आत्मस्तुति हो मगर वह प्रेम, जो मेरी कमजोरियों के बावजूद मोहिनी को मुझसे था उसका एक कतरा भी मुझे बेसुध करने के लिए काफी था। मेरा हृदय इतना विशाल ही न था, मुझे आश्चर्य होता था कि मुझमें वह कौन-सा गुण था जिसने मोहिनी को मेरे प्रति प्रेम से विह्वल कर दिया था। सौन्दर्य, आचरण की पवित्रता, मर्दानगी का जौहर यही वह गुण हैं जिन पर मुहब्बत निछावर होती है। मगर मैं इनमें से एक पर भी गर्व नहीं कर सकता था। शायद मेरी कमजोरियॉँ ही उस प्रेम की तड़प का कारण थीं।
मोहिनी में वह अदायें न थीं जिन पर रंगीली तबीयतें फिदा हो जाया करती हैं। तिरछी चितवन, रूप-गर्व की मस्ती भरी हुई आंखें, दिल को मोह लेने वाली मुस्कराहट, चंचल वाणी, उनमें से कोई चीज यहॉँ न थी! मगर जिस तरह चॉँद की मद्धिम सुहानी रोशनी में कभी-कभी फुहारें पड़ने लगती हैं, उसी तरह निश्छल प्रेम में उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट कौंध जाती और आंखें नम हो जातीं। यह अदा न थी, सच्चे भावों की तस्वीर थी जो मेरे हृदय में पवित्र प्रेम की खलबली पैदा कर देती थी।

शाम का वक्त था, दिन और रात गले मिल रहे थे। आसमान पर मतवाली घटायें छाई हुई थीं और मैं मोहिनी के साथ उसी हौज के किनारे बैठा हुआ था। ठण्डी-ठण्डी बयार और मस्त घटायें हृदय के किसी कोने में सोते हुए प्रेम के भाव को जगा दिया करती हैं। वह मतवालापन जो उस वक्त हमारे दिलों पर छाया हुआ था उस पर मैं हजारों होशमंदियों को कुर्बान कर सकता हूँ। ऐसा मालूम होता था कि उस मस्ती के आलम में हमारे दिल बेताब होकर आंखों से टपक पड़ेंगे। आज मोहिनी की जबान भी संयम की बेड़ियों से मुक्त हो गई थी और उसकी प्रेम में डूबी हुई बातों से मेरी आत्मा को जीवन मिल रहा था।
एकाएक मोहिनी ने चौंककर गंगा की तरफ देखा। हमारे दिलों की तरह उस वक्त गंगा भी उमड़ी हुई थी।
पानी की उस उद्विग्न उठती-गिरती सतह पर एक दिया बहता हुआ चला जाता था और और उसका चमकता हुआ अक्स थिरकता और नाचता एक पुच्छल तारे की तरह पानी को आलोकित कर रहा था। आह! उस नन्ही-सी जान की क्या बिसात थी! कागज के चंद पुर्जे, बांस की चंद तीलियां, मिट्टी का एक दिया कि जैसे किसी की अतृप्त लालसाओं की समाधि थी जिस पर किसी दुख बँटानेवाले ने तरस खाकर एक दिया जला दिया था मगर वह नन्हीं-सी जान जिसके अस्तित्व का कोई ठिकाना न था, उस अथाह सागर में उछलती हुई लहरों से टकराती, भँवरों से हिलकोरें खाती, शोर करती हुई लहरों को रौंदती चली जाती थी। शायद जल देवियों ने उसकी निर्बलता पर तरस खाकर उसे अपने आंचलों में छुपा लिया था।
जब तक वह दिया झिलमिलाता और टिमटिमाता, हमदर्द लहरों से झकोरे लेता दिखाई दिया। मोहिनी टकटकी लगाये खोयी-सी उसकी तरफ ताकती रही। जब वह आंख से ओझल हो गया तो वह बेचैनी से उठ खड़ी हुई और बोली- मैं किनारे पर जाकर उस दिये को देखूँगी।
जिस तरह हलवाई की मनभावन पुकार सुनकर बच्चा घर से बाहर निकल पड़ता है और चाव-भरी आंखों से देखता और अधीर आवाजों से पुकारता उस नेमत के थाल की तरफ दौड़ता है, उसी जोश और चाव के साथ मोहिनी नदी के किनारे चली।
बाग से नदी तक सीढ़ियॉँ बनी हुई थीं। हम दोनों तेजी के साथ नीचे उतरे और किनारे पहुँचते ही मोहिनी ने खुशी के मारे उछलकर जोर से कहा-अभी है! अभी है! देखो वह निकल गया!
वह बच्चों का-सा उत्साह और उद्विग्न अधीरता जो मोहिनी के चेहरे पर उस समय थी, मुझे कभी न भूलेगी। मेरे दिल में सवाल पैदा हुआ, उस दिये से ऐसा हार्दिक संबंध, ऐसी विह्वलता क्यों? मुझ जैसा कवित्वशून्य व्यक्ति उस पहेली को जरा भी न बूझ सका।
मेरे हृदय में आशंकाएं पैदा हुई। अंधेरी रात है, घटायें उमड़ी हुई, नदी बाढ़ पर, हवा तेज, यहॉँ इस वक्त ठहरना ठीक नहीं। मगर मोहिनी! वह चाव-भरे भोलेपन की तस्वीर, उसी दिये की तरफ आँखें लगाये चुपचाप खड़ी थी और वह उदास दिया ज्यों हिलता मचलता चला जाता था, न जाने कहॉँ किस देश!
मगर थोड़ी देर के बाद वह दिया आँखों से ओझल हो गया। मोहिनी ने निराश स्वर में पूछा-गया! बुझ गया होगा?
और इसके पहले कि मैं जवाब दूँ वह उस डोंगी के पास चली गई, जिस पर बैठकर हम कभी-कभी नदी की सैरें किया करते थे, और प्यार से मेरे गले लिपटकर बोली-मैं उस दिये को देखने जाऊँगी कि वह कहॉँ जा रहा है, किस देश को।
यह कहते-कहते मोहिनी ने नाव की रस्सी खोल ली। जिस तरह पेड़ों की डालियॉँ तूफान के झोंकों से झंकोले खाती हैं उसी तरह यह डोंगी डॉँवाडोल हो रही थी। नदी का वह डरावना विस्तार, लहरों की वह भयानक छलॉँगें, पानी की वह गरजती हुई आवाज, इस खौफनाक अंधेरे में इस डोंगी का बेड़ा क्योंकर पार होगा! मेरा दिल बैठ गया। क्या उस अभागे की तलाश में यह किश्ती भी डूबेगी! मगर मोहिनी का दिल उस वक्त उसके बस में न था। उसी दिये की तरह उसका हृदय भी भावनाओं की विराट, लहरों भरी, गरजती हुई नदी में बहा जा रहा था। मतवाली घटायें झुकती चली आती थीं कि जैसे नदी के गले मिलेंगी और वह काली नदी यों उठती थी कि जैसे बदलों को छू लेंगी। डर के मारे आँखें मुंदी जाती थीं। हम तेजी के साथ उछलते, कगारों के गिरने की आवाजें सुनते, काले-काले पेड़ों का झूमना देखते चले जाते थे। आबादी पीछे छूट गई, देवताओं को बस्ती से भी आगे निकल गये। एकाएक मोहिनी चौंककर उठ खड़ी हुई और बोली- अभी है! अभी है! देखों वह जा रहा है।
मैंने आंख उठाकर देखा, वह दिया ज्यों का त्यों हिलता-मचलता चला जाता था।


उस दिये को देखते हम बहुत दूर निकल गए। मोहिनी ने यह राग अलापना शुरू किया:
मैं साजन से मिलन चली

कैसा तड़पा देने वाला गीत था और कैसी दर्दभरी रसीली आवाज। प्रेम और आंसुओं में डूबी हुई। मोहक गीत में कल्पनाओं को जगाने की बड़ी शक्ति होती है। वह मनुष्य को भौतिक संसार से उठाकर कल्पनालोक में पहुँचा देता है। मेरे मन की आंखों में उस वक्त नदी की पुरशोर लहरें, नदी किनारे की झूमती हुई डालियॉँ, सनसनाती हुई हवा सबने जैसे रूप धर लिया था और सब की सब तेजी से कदम उठाये चली जाती थीं, अपने साजन से मिलने के लिए। उत्कंठा और प्रेम से झूमती हुई युवती की धुंधली सपने-जैसी तस्वीर हवा में, लहरों में और पेड़ों के झुरमुट में चली जाती दिखाई देती और कहती थी- साजन से मिलने के लिए! इस गीत ने सारे दृश्य पर उत्कंठा का जादू फूंक दिया।
मैं साजन से मिलन चली
साजन बसत कौन सी नगरी मैं बौरी ना जानूँ
ना मोहे आस मिलन की उससे ऐसी प्रीत भली
मैं साजन से मिलन चली
मोहिनी खामोश हुई तो चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था और उस सन्नाटे में एक बहुत मद्धिम, रसीला स्वप्निल-स्वर क्षितिज के उस पार से या नदी के नीचे से या हवा के झोंकों के साथ आता हुआ मन के कानों को सुनाई देता था।
मैं साजन से मिलन चली
मैं इस गीत से इतना प्रभावित हुआ कि जरा देर के लिए मुझे खयाल न रहा कि कहॉँ हूँ और कहॉँ जा रहा हूँ। दिल और दिमाग में वही राग गूँज रहा था। अचानक मोहिनी ने कहा-उस दिये को देखो। मैंने दिये की तरफ देखा। उसकी रोशनी मंद हो गई थी और आयु की पूंजी खत्म हो चली थी। आखिर वह एक बार जरा भभका और बुझ गया। जिस तरह पानी की बूँद नदी में गिरकर गायब हो जाती है, उसी तरह अंधेरे के फैलाव में उस दिये की हस्ती गायब हो गई ! मोहिनी ने धीमे से कहा, अब नहीं दिखाई देता! बुझ गया! यह कहकर उसने एक ठण्डी सांस ली। दर्द उमड़ आया। आँसुओं से गला फंस गया, जबान से सिर्फ इतना निकला, क्या यही उसकी आखिरी मंजिल थी? और आँखों से आँसू गिरने लगे।
मेरी आँखों के सामने से पर्दा-सा हट गया। मोहिनी की बेचैनी और उत्कंठा, अधीरता और उदासी का रहस्य समझ में आ गया और बरबस मेरी आंखों से भी आँसू की चंद बूंदें टपक पड़ीं। क्या उस शोर-भरे, खतरनाक, तूफानी सफर की यही आखिरी मंजिल थी?
दूसरे दिन मोहिनी उठी तो उसका चेहरा पीला था। उसे रात भर नींद नहीं आई थी। वह कवि स्वभाव की स्त्री थी। रात की इस घटना ने उसके दर्द-भरे भावुक हृदय पर बहुत असर पैदा किया था। हँसी उसके होंठों पर यूँ ही बहुत कम आती थी, हॉँ चेहरा खिला रहता थां आज से वह हँसमुखपन भी बिदा हो गया, हरदम चेहरे पर एक उदासी-सी छायी रहती और बातें ऐसी जिनसे हृदय छलनी होता था और रोना आता था। मैं उसके दिल को इन ख्यालों से दूर रखने के लिए कई बार हँसाने वाले किस्से लाया मगर उसने उन्हें खोलकर भी न देखा। हॉँ, जब मैं घर पर न होता तो वह कवि की रचनाएं देखा करती मगर इसलिए नहीं कि उनके पढ़ने से कोई आनन्द मिलता था बल्कि इसलिए कि उसे रोने के लिए खयाल मिल जाता था और वह कविताएँ जो उस जमाने में उसने लिखीं दिल को पिघला देने वाले दर्द-भरे गीत हैं। कौन ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें पढ़कर अपने आँसू रोक लेगा। वह कभी-कभी अपनी कविताएँ मुझे सुनाती और जब मैं दर्द में डूबकर उनकी प्रशंसा करता तो मुझे उसकी ऑंखों में आत्मा के उल्लास का नशा दिखाई पड़ता। हँसी-दिल्लगी और रंगीनी मुमकिन है कुछ लोगों के दिलों पर असर पैदा कर सके मगर वह कौन-सा दिल है जो दर्द के भावों से पिघल न जाएगा।
एक रोज हम दोनों इसी बाग की सैर कर रहे थे। शाम का वक्त था और चैत का महीना। मोहिनी की तबियत आज खुश थी। बहुत दिनों के बाद आज उसके होंठों पर मुस्कराहट की झलक दिखाई दी थी। जब शाम हो गई और पूरनमासी का चॉँद गंगा की गोद से निकलकर ऊपर उठा तो हम इसी हौज के किनारे बैठ गए। यह मौलसिरियों की कतार ओर यह हौज मोहिनी की यादगार हैं। चॉँदनी में बिसात आयी और चौपड़ होने लगी। आज तबियत की ताजगी ने उसके रूप को चमका दिया था और उसकी मोहक चपलतायें मुझे मतवाला किये देती थीं। मैं कई बाजियॉँ खेला और हर बार हारा। हारने में जो मजा था वह जीतने में कहॉँ। हल्की-सी मस्ती में जो मजा है वह छकने और मतवाला होने में नहीं।

चॉँदनी खूब छिटकी हुई थी। एकाएक मोहिनी ने गंगा की तरफ देखा और मुझसे बोली, वह उस पार कैसी रोशनी नजर आ रही है? मैंने भी निगाह दौड़ाई, चिता की आग जल रही थी लेकिन मैंने टालकर कहा- सॉँझी खाना पका रहे हैं।
मोहिनी को विश्वास नहीं हुआ। उसके चेहरे पर एक उदास मुस्कराहट दिखाई दी और आँखें नम हो गईं। ऐसे दुख देने वाले दृश्य उसके भावुक और दर्दमंद दिल पर वही असर करते थे जो लू की लपट फूलों के साथ करती है।
थोड़ी देर तक वह मौन, निश्चला बैठी रही फिर शोकभरे स्वर में बोली-‘अपनी आखिरी मंजिल पर पहुँच गया!’

संदर्भ – प्रस्तुत कहानी हिन्दी साहित्य जगत के कथानायक प्रेमचंद की रचना है। अपने लेखन काल मे प्रेमचंद ने सैकड़ो कहानियां लिखी। उन्होने ने हिन्दी लेखन में यथार्थवाद की शुरुआत की। उनके रचनाओ में हने कई रंग देखने को मिलते है। मुख्य रूप से प्रेमचंद ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो का सजीव वर्णन अपने साहित्यिक रचना के माध्यम से किया है। उनकी रचनाओ में हमे तत्कालीन दलित समाज, स्त्री दशा एवं समाज में व्याप्त विसंगतियाँ का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से होता है।
प्रेमचंद के संक्षिप्त जीवन परिचय जानने के लिए यहाँ क्लिक करे,

कप्तान साहब….प्रेमचंद

जगत सिंह को स्कूल जान कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता और अमरूदों के साथ माली की गालियॉँ बड़े शौक से खाता। कभी दरिया की सैर करता और मल्लाहों को डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। गालियॉँ खाने में उसे मजा आता था। गालियॉँ खाने का कोइ्र अवसर वह हाथ से न जाने देता। सवार के घोड़े के पीछे ताली बजाना, एक्को को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के विषय थे। आलसी काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब अवसर मिलता घर से रूपये उड़ा ले जात। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच न होता था। घर में शीशियॉँ और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दी। पुराने दिनों की कितनी चीजें घर में पड़ी थीं, उसके मारे एक भी न बची। इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालें को आहट तक न मिली।
उसके पिता ठाकुर भक्तस सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भक्तसिंह जिन इरादों से यहॉँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहॉँ बंद हो गये। यहॉँ सबसे पुराना घराँव थां न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। अन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपके में मार खा लिया करता थां अगर वह अपने पिता के हाथ पकड़ लेता, तो वह हल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हॉँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का भी उस पर असर न होता था।
जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कॉँव-कॉँव मच जाती, मॉँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियॉँ देन लगती; मानो घर में कोई सॉँड़ घुस आया हो। घर ताले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया थां कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहॉँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जात, वही खा लेता।
ज्यों-ज्यों घर वालें को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहॉँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गॉँजे वाले ने धुऑंधार तकाजे करने शुरू किय। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झॉँक में रहता; पर घात न मिलत थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, जो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाय; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निक पड़े तो वह बड़े संकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाय और अनजान में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसे भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया।
गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की ऑंखें में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुंदी होगी— इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पॉँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा ओर वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने केक लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हे ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जायेंगे!
उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दॉँव पर दस-दस रूपए रख दतेा है, नफा न होता, तो वह ठाट कहॉँ से निभाता? इस आननद-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जायें ओर वह लहरों में बह जाय।
उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया।

2

बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था।
जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा—क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा—जगतसिंह?
‘क्या चाहते हो।‘
‘फौज में भरती कर लीजिए।‘
‘मरने से तो नहीं डरते?’
‘बिलकुल नहीं—राजपूत हूँ।‘
‘बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।‘
‘इसका भी डर नहीं।‘
‘अदन जाना पड़ेगा।‘
‘खुशी से जाऊँगा।‘
कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रह जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सॉँस ली और मुँह ढॉँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बर उसे प्रियजानों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गॉँजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहूद-मित्रों के जमघट ऑंखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आय, पानी में कूद पड़े।

3

जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भॉँति-भॉँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिनह पुराने संस्कार फिर जाग्रत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्झ हो रही थी; लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नेराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानिक कके कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मॉँग। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ थां अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था—माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किय हें, आप लेग मुझसे तंग आ गयी थी, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आर्शीवाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।‘
यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। आसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता—कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आप वह विक्षिप्तों की भॉँति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बेठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकार, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया थां जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह कॉँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला ओर पत्र पढ़ा। लिखा था—‘तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पॉँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।‘
जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कह —‘हुजूर, मेरी मॉँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।‘
कप्तान ने कठोर ऑंखों से देखकर कहा—अभी छुट्टी नहीं मिल सकती।
‘तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।‘
‘अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।‘
‘मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।‘
‘रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाभ पर जाना पड़ेगा।‘
‘लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहॉँ से जायेंगे?’
‘बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।‘

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चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस महिम में सबकी हिम्मते जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्योरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर ओर मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीतन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा—कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो!
लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है—दो-चार ऑंसू की बँदे अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे?

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सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता हें, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल-पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मीयाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाल था ही कौन?
एक बूढ़ किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसक कंधा हिलाया और बोला—कहो भगत, कोई घर से आया?
भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा—घर पर है ही कौन?
‘घर तो चलोगे ही?’
‘मेरे घर कहॉँ है?’
‘तो क्या यही पड़े रहोंगे?’
‘अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।‘
आज चार साल के बाद भगतसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीतन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य ओर दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लियां न-जाने उस बेचारे की क्या दख्शा हुई। लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का हे। खानदान की निशानी तो हे। मरूँगा तो चार ऑंसू तो बहायेगा; दो चिल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं कियां जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भॉँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मेने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उस वमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न कियां उसी का दंड है। जहॉँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहॉँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है?

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सबेरा हुआ। आशा की सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियॉँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आश के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर धरे अंधकार था।
जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुलित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जात, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बॉँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे।
अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहॉँ जायँ?
सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े हाकर सलाम किया।
भक्तससिंह ने मन में कहा—एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं।
फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया।
भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले—अरे! बेटा जगतसिंह!
जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा।

 

 

  संदर्भ – प्रस्तुत कहानी हिन्दी साहित्य जगत के कथानायक प्रेमचंद की रचना है। अपने लेखन काल मे प्रेमचंद ने सैकड़ो कहानियां लिखी। उन्होने ने हिन्दी लेखन में यथार्थवाद की शुरुआत की। उनके रचनाओ में हने कई रंग देखने को मिलते है। मुख्य रूप से प्रेमचंद ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो का सजीव वर्णन अपने साहित्यिक रचना के माध्यम से किया है। उनकी रचनाओ में हमे तत्कालीन दलित समाज, स्त्री दशा एवं समाज में व्याप्त विसंगतियाँ का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से होता है।
प्रेमचंद के संक्षिप्त जीवन परिचय जानने के लिए यहाँ क्लिक करे,

प्रेमचंद, एक जीवन परिचय(biography of premchand in hindi)

प्रेमचंद महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। इन्हे हिन्दी साहित्य का कथानायक और उपन्यास सम्राट भी कहा जाता है। प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को  वाराणसी  केनिकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था। उनके पिता  लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद  का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी सेहुआ।  अपने पढ़ने के शौक़ के चलते साहित्य मे उनकी रुचि बचपन से ही हो गई। बचपन में ही उन्होने ने देशी विदेशी कई साहित्य की किताबें पढ़ डाली।

Premchand 1

सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। उस समय के प्रथा के अनुसार उनकी शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में ही हो गया जो की सफल नहीं रहा। बाद में उन्होने दूसरा विवाह शिवरानी देवी से किया जो की बाल विधवा थी।

पिता की असमय देहांत के कारण घर परिवार की ज़िम्मेदारी भी बहुत ही कम उम्र मे उनके ऊपर आ गई। अपने पिता के देहांत के बाद भी उन्होने अपनी शिक्षा जारी रखा एवं मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद जीवनयापन के लिए एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी कर लिया। अध्यापन का कार्य करते हुए ही उन्होने ब० ए० पास किया एवं शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए। बाद में गांधीजी से प्रेरित होकर उन्होने नौकरी से इस्तीफा  दे दिया और स्वयं को देशसेवा एवं लेखन कार्य में पूरी तरह समर्पित कर दिया।

आधुनिक हिन्दी साहित्य पर प्रेमचंद का बड़ा ही व्यापक प्रभाव है। उनका साहित्यिक जीवन 1901 से ही शुरू हो गया था। पहले पहल वे नाबाब राय के नाम से लिखते थे। 1908 मे प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन अर्थात राष्ट्र का विलाप  नाम से प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी सरकार ने रोक लगा दी और इसके लेखक को भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर जला दी गईं। इस घटना के बाद प्रेमचंद के मित्र एवं ज़माना पत्रिका के संपादक  मुंशी दयानारायण निगम  ने उन्हे प्रेमचंद के नाम से लिखने की सलाह दिया। इसके बाद धनपत राय, प्रेमचंद  के नाम से लिखने लगे। प्रेमचंद के नाम से उनकी पहली कहानी ज़माना पत्रिका के दिसम्बर 1910 मे प्रकाशित हुई। इस कहानी का नाम बड़े घर की बेटी  था। अपने लेखन काल मे प्रेमचंद ने सैकड़ो कहानियां लिखी। उन्होने ने हिन्दी लेखन में यथार्थवाद की शुरुआत की। उनके रचनाओ में  हमे कई रंग देखने को मिलते है। मुख्य रूप से प्रेमचंद ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो का सजीव वर्णन अपने साहित्यिक रचना के माध्यम से किया है। उनकी रचनाओ में हमे तत्कालीन दलित समाज, स्त्री दशा एवं समाज में व्याप्त विसंगतियाँ का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से होता है।

महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होने 1921 में अपनी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद कुछ दिनों तक उन्होने ने मर्यादा नामक पत्रिका में सम्पादन का कार्य किया।उसके बाद छह साल तक माधुरी नामक पत्रिका में संपादन का काम किया। 1930 से 1932 के बीच उन्होने अपना खुद का मासिक पत्रिका हंस  एवं साप्ताहिक पत्रिका जागरण  निकलना शुरू किया। कुछ दिनों तक उन्होने ने मुंबई मे फिल्म के लिए कथा भी लिखी। उनकी कहानी पर बनी फिल्म का नाम मज़दूर था, यह 1934 में प्रदर्शित हुई। परंतु फिल्मी दुनिया उन्हे रास नहीं आयी और वह अपने कांट्रैक्ट को पूरा किए बिना ही बनारस वापस लौट आए। प्रेमचंद ने मूल रूप से हिन्दी मे 1915 से कहानियां लिखना शुरू किया। उनकी पहली हिन्दी कहानी 1925 में  सरस्वती पत्रिका  में सौत  नाम से प्रकाशित हुई। 1918 ई से उन्होने उपन्यास लिखना शुरू किया। उनके पहले उपन्यास का नाम सेवासदन  है। प्रेमचंद ने लगभग बारह उपन्यास तीन सौ के करीब कहानियाँ कई लेख एवं नाटक लिखे है।

प्रेमचंद द्वारा रचित कहानियों में  पूस की रात, ईदगाह,बड़े भाई साहब, अलगोझा,गुल्ली डंडा, पंच परमेश्‍वरदो बैलों की कथा, बूढी काकी, मंत्र, कफन इत्यादि प्रमुख कहानियाँ है।

प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यासों में सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान इत्यादि प्रमुख है। उनक अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र  है जो अपूर्ण है इसी उपन्यास के रचना के दौरान 8 October 1936 को लंबी बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने यह उपन्यास पूरा किया।

प्रेमचंद ने संग्राम‘ ‘कर्बलाऔर प्रेम की वेदी‘ नामक नाटकों की रचना किया है। मरने के बाद प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर  नाम से आठ भागो मे प्रकाशित हुई है। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का योगदान अतुलनीय है। बंगाल के प्रमुख उपन्यासकार शरत चंद्रचट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर नए उपनाम से संबोधित किया था। उनके बेटे अमृत राय ने कलम का सिपाही  नाम से उनकी जीवनी लिखी है जो उनके जीवन पर विस्तृत प्रकाश डालती है।

कौन कहता है कि कोई अमर नहीं हो सकता, जबतक यह दुनिया है प्रेमचंद अपने रचना के माध्यम सदैव सभी के दिलों से अमर रहेंगे।  प्रस्तुत लेख में मैंने कथानायक प्रेमचंद के जीवन (biography of premchand in hindi)  को संक्षिप्त रूप से वर्णन करने का प्रयास किया है।

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         रबीन्द्रनाथ टैगोर, एक जीवन परिचय

मोटोरोला “Moto G” स्मार्टफोन Specifications एवं मूल्य…

Moto G एक Android स्मार्टफोन है जो मोटोरोला कंपनी द्वारा 13 नवम्बर 2013 को लांच किया गया था। परन्तु भारत मे यह फोन 5 फ़रवरी को लांच किया गया। अपने लांच के पहले से आजतक यह स्मार्टफोन बाज़ार एवं User के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है। जिसका कारण इसका मूल्य एवं Specification है। यह स्मार्ट फोन 6 फ़रवरी को ऑनलाइन Website के द्वारा बिक्री के लिए प्रस्तुत किया गया।  । यह फोन 16GB एवं 8GB के दो अलग-अलग Models मे लांच किया गया था एवं 1 घंटे के अंडर ही Out Of Stock हो गया। परन्तु कुछ ही दिनों के अंदर यह फिर से Online बिक्री के लिए उपलब्ध हो गया।

Moto G
Moto G

आइए जाने इस स्मार्ट फोन की खूबियो को जिनके चलते भारतीय मोबाइल बाज़ार में यह स्मार्टफोन इतना सफल हुआ है…

  • ऑपरेटिंग सिस्टम – यह फोन Android के 4.3.2 Jelly Been ऑपरेटिंग सिस्टम पर कहलता है एवं कंपनी बहुत ही जल्दी इसका Android 4.4 Kitkat update लांच करने वाली है जो Android का नवीनतम operating सिस्टम है।
  • स्क्रीन Size & Resolution – इसका स्क्रीन 4.5 इंच का है तथा यह 720p HD Resolution को सपोर्ट करता है।
  • Processor– इस फोन में 1.3 GHz का Quad Core Processor एवं 1GB रैम है जो इस फोन के प्रयोग को बेहतर बनाता है।
  •  कैमरा– इस स्मार्ट फोन मे 5.0 मेगापिक्सेल का Rear कैमरा LED फ्लैश के साथ एवं 1.3 मेगापिक्सेल का Front कैमरा दिया गया है। इससे आप Slow Motion विडियो भी शूट कर सकते है।
  • Batteryइसमे 2070 mAh की Li-lon Battery है जो 24 घंटे की मिश्रित क्षमता प्रदान करता है।
  • Dual SIMयह स्मार्टफोन डुयल SIM वाला है जिसमे आप दोनों सिम को Customize कर सकते है।
  • Storageयह स्मार्ट फोन दो Model 8GB एवं 16GB में उपलब्ध है तथा इसमे अलग से मेमोरी कार्ड स्लॉट नहीं दिया गया है।
  • मूल्य (Price) – इस स्मार्ट फोन का 8GB Model का मूल्य 12499 रूपये एवं 16GB Model का मूल्य 13999 रूपये है जो इस प्रकार के Specification वाले फोन के लिए बहुत ही आकर्षक है। इस स्मार्ट फोन के सफल होने मे इस स्मार्ट फोन के मूल्य का बहुत बड़ा योगदान है।

Image Credit- Moto G Launch by Vernon Chan(CC BY)

फेसबूक Look Back क्या है तथा इसे कैसे Edit करते है?

Facebook Look Back2

Look Back सोशल नेटवर्किंग वैबसाइट Facebook का एक नया Feature है जिसमे कोई भी Facebook User अपने Facebook Joining से लेकर अबतक के Highlights को विडियो के रूप मे Enjoy कर सकता है। इसमे किसी भी Facebook User के Photograph एवं उसके द्वारा Share किए गए पोस्ट को शामिल किया जा सकता है। यह एक नए प्रकार का Experience है जो आपको आपके Facebook Life से जूड़ी यादों को ताजा करने का मौका देता है। Look Back विडियो मे background संगीत भी दिया गया है जो इसे और भी आकर्षक बनाता है।

Facebook ने Look Back Feature को कुछ समय पहले ही प्रस्तुत किया था परंतु इसमे एडिट करने की सुविधा नहीं थी। पर अपने दसवें Birthday पर Facebook ने यह सुविधा भी अपने सभी Users को प्रदान कर दिया है। अब कोई भी Facebook User अपने Look back विडियो को अपने मन मुताबिक़ Edit एवं Customize कर सकता है।

इसके लिए आपको अपने Look Back मूवी के ऊपरी हिस्से मे दिये गए एडिट आइकॉन पर क्लिक करना होगा।

Facebook Look Back

उसपर क्लिक करने पर आप अगले Page पर Redirect कर दिया जाएंगे आप अपने Look Back विडियो के अलग-अलग हिस्सो को अपने प्रकार से Set कर सकते है। एडिट करने के बाद आप नीचे दिये गए Update आइकॉन पर क्लिक कर के आप इसे सेव कर सकते है तथा उसे Share भी कर सकते है।

Image Credit- www.facebook.com

बिना Software की सहायता के किसी भी वैबसाइट को ब्लॉक करे…

आज के Digital युग में कंप्यूटर एवं इन्टरनेट के प्रयोग एवं सेवाओ में लगातार वृद्धि हो रही है। रोज हजारो की संख्या में नई Websites का निर्माण हो रहा है। जिनपर कोई अंकुश नहीं है। इनमे कई Websites ऐसी होती है जिनकी सामग्री अश्लील, अपराध अथवा जुआ(Gambling) इत्यादि को प्ररित करने वाली होती है। अत: इस प्रकार की Websites को कंप्यूटर पर ब्लाक करने की आवश्कता होती है।

आज कल का लगभग हर कम्प्युटर Users, Social Networking Websites का प्रयोग करता है। कई बार Social Networking Websites का यह प्रयोग एक प्रकार का नशा बन जाता है। स्कूल एवं कॉलेज में भी Social Networking Websites के प्रयोग को बैन करना आवश्यक होता है। अतः इन प्रकार की Social Networking Websites को भी ब्लॉक करने की आवश्यकता होती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि किसी भी Website को किसी कंप्यूटर पर आसानी से बिना किसी Software की सहायता के कैसे ब्लॉक किया जा सकता है?

किसी भी वेबसाइट को किसी खास कंप्यूटर में नीचे दिये गए विधि से ब्लॉक किया जा सकता है…

  • पहले My Computer को खोले
  • फिर C Drive को खोले
  • Windows फोल्डर को खोले
  • system32 फोल्डर को खोले
  • drivers फोल्डर को खोले
  • etc फोल्डर को खोले
  • वहाँ एक Host फाइल होगा इसे Notepad पर खोले.
  • खोलने के पश्चात इसके अंत कि दो लाइन को देखे जो निम्न प्रकार से होंगी…

 127.0.0.1         localhost

 ::1                     localhost

  • अब जो भी वेबसाइट ब्लॉक करनी है उसे इसके नीचे इस प्रकार से लिखे…

 127.0.0.1      yahoo.com

 127.0.0.1      facebook.com

block websites

  • फाइल को सेव करे एवं Exit करे
  • Websites block हो चुके है
  • आप इस प्रकार से कई वेबसाइट को ब्लॉक कर सकते है।

नोट: कभी कभी इस प्रकार से फाइल को सेव करने के लिए सिस्टम Admin Permission के लिया पूछा जा सकता है। जब आप फ़ाइल को सेव करने कि कोशिश करते है तो निम्न प्रकार का विंडोज खुल कर आ जाता है

administrator permission

अगर इस प्रकार का संदेश प्राप्त हो तो File सेव करने के लिए Administrator Permission की आवश्यकता होती है। इसके लिए आपको नीचे दिये गए विधि के अनुसार फ़ाइल को खोलना एवं सेव करना होगा।

  • सबसे पहले नीचे दिये गए चित्र के अनुसार Start Menu में जाकर Notepad पर Right Click करे एवं Run as administrator पर click करे।

notepad

  • इससे एक New Notepad खुल जाएगा।
  • अब नीचे दिये गए चित्र के अनुसार इस Notepad के फ़ाइल Menu में जाकर Open पर Click करे।

notepad2

  • अब नीचे दिये गए चित्र के अनुसार C Drive पर Click करे।
  • फिर Windows पर क्लिक करे।

Notepad3

  • उसके बाद ऊपर बताए गए विधि के अनुसार System 32—Drivers—Etc फोंल्डर को Open करते हुए Host फ़ाइल को Open करे एवं जिस Website को भी Block करना चाहते हो उसे Block करे।

Websites जिनसे आप पूरे भारत में Free में एसएमएस भेज सकते है।

मोबाइल के द्वारा आज भी SMS भेजना आसान नहीं है इसमे समय और पैसा दोनों लगता है। लेकिन अगर आपके पास इंटरनेट कनैक्शन है तो यह इतना कठिन भी नहीं है। इंटरनेट के सहायता से आप पूरे भारत में कहीं भी फ्री मे SMS भेज सकते है। इंटरनेट पर कई Websites है जो यह सुविधा फ्री मे प्रदान करती है तो आइए ऐसे ही कुछ Websites के बारे में जाने।

SMS

Mycantos

इस Website के माध्यम से आप 300 अच्छरों तक के एसएमएस को पूरे भारत में कहीं भी भेज सकते है। इस Website पर आपको अपने मोबाइल नंबर से Registration करना होगा। इसके पश्चात आप इस Website की सेवा का लाभ उठा सकते है।

Sms440

इस Website के द्वारा आप 440 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आपका मोबाइल नंबर भेजने वाले के पहचान के रूप मे SMS पाने वाले को प्राप्त होगा। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर से Registration कर सकते है। इसमे आप Phone Book बनाकर ग्रुप SMS भी भेज सकते है।

7waysms

इस Website के द्वारा आप 260 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर और e-मेल से Registration कर सकते है। इस Website के द्वारा आप अपना Mobile भी Free में रीचार्ज करा सकते है। इस Website के द्वारा आप SMS भेज कर पैसे भी कमा सकते है।

Rapidmaza

इस Website के द्वारा आप 500 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इस Website मे आपको Registration की कोई आवश्यकता नहीं है।

Smsindia

इस Website के द्वारा आप 320 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर और e-मेल से Registration कर सकते है। इस Website के द्वारा आप Live chat और Group SMS भी कर सकते है।

Fullonsms

इस Website के द्वारा आप 140 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर और e-मेल से Registration कर सकते है। इस Website के द्वारा आप Unlimited Group SMS भी कर सकते है।

Way2sms

इस website के द्वारा भी आप 140 अच्छरों तक के एसएमएस फ्री में भेज सकते है। इस website ने Free International SMS की सेवा भी शुरू की है। यह Free में SMS भेजेने की एक विश्वसनीय भारतीय Website है। यह Website आपको फ्री मोबाइल रीचार्ज की सुविधा भी प्रदान करता है।

160by2

इस Website के द्वारा आप 140 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर और e-मेल से Registration कर सकते है। यह भी Free में SMS भेजेने की एक विश्वसनीय भारतीय Website है।

Indyarocks

इस website के द्वारा भी आप 140 अच्छरों तक के एसएमएस फ्री में भेज सकते है। यह मुख्यत: एक Social Networking Website है जो अपने Users को Free में SMS भेजने की सुविधा भी प्रदान करती है।

Atrochatro

इस Website के द्वारा आप 148 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने e-मेल से Registration कर सकते है।

Ultoo

इस Website के द्वारा आप 140 अच्छरों तक के SMS पूरे भारत मे कहीं भी भेज सकते है। इसमे आप अपने मोबाइल नंबर और e-मेल से Registration कर सकते है। यह Website आपको फ्री मोबाइल रीचार्ज की सुविधा भी प्रदान करता है।

 

Note- उपरोक्त दिये गए Websites से आप free में पूरे भारत में SMS भेज सकते है। इनमे से कुछ Websites को मैंने व्यक्तिगत रूप से प्रयोग किया है जो की बहुत ही संतोषजनक अनुभव रहा है।

    यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है की अगर आपका मोबाइल नंबर DND Registered है तो आप इनमे से कुछ Websites का लाभ नहीं उठा सकते है साथ ही Government के नियम कानून के द्वारा भी कुछ Websites के प्रयोग मे कुछ परिवर्तन हो सकता है।

प्रमुख भारतीय मोबाइल ऑपरेटर के Access Point Name’s (APN)

APN क्या है…

एक Access Point Name (APN) एक जीपीआरएस या 3 जी, आदि मोबाइल नेटवर्क और अन्य कंप्यूटर नेटवर्क एवं सार्वजनिक इंटरनेट के बीच एक प्रवेश द्वार का नाम है। इसे सही प्रकार से प्रयोग करके हम wireless इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते है। इसका इस्तेमाल हम मोबाइल अथवा मोडेम के द्वारा कर सकते है।

Mobile Operator Logos

सही एवं निर्बाध इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए APN Setting का सही होना आवश्यक है। APN Setting में चार मुख्य भाग होते है ये है।

  • APN (Access Point Name)
  • डायल नंबर
  • User नाम
  • पासवर्ड

पर इनमे APN एवं डायल नंबर अधिक महत्वपूर्ण होता है।

प्रमुख भारतीय मोबाइल ऑपरेटर के Access Point Name’s (APN) और Setting…

Mobile operator APN Dail No. User Name Password
Reliance RCOMNET OR SMARTNET *99# Blank Blank
Tata Docomo TATA.DOCOMO.INTERNET *99# Blank Blank
Vodafone www *99# Blank Blank
Videocon vgprs or vinternet *99# Blank Blank
Uninor Uninor *99# Blank Blank
BSNL bsnlnet *99# Blank Blank
IDEA internet *99# Blank Blank
Airtel airtelgprs.com *99# Blank Blank
Aircel aircelgprs *99***# Blank Blank
Virgin Mobile vinternet *99# Blank Blank

ईमेल हैकिंग ,कैसे जाने की आपका ईमेल सुरक्षित है या नहीं।

आजकल का युग इन्टरनेट क्रांति का युग है। जहाँ लगभग सभी क्षेत्रो में इन्टरनेट की उपयोगिता एवं उसपर मनुष्य की निर्भरता बढ़ी है चाहे वह क्षेत्र व्यापार हो, शिक्षा हो अथवा मनोरंजन हो।

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ईमेल भी इन्टरनेट द्वारा प्राप्त एक ऐसी सेवा है जिसपर मनुष्य की निर्भरता बहुत ही अधिक है। हम अपने बहुत सारे पत्र व्यवहार एवं गोपनीय डाटा का आदान-प्रदान ईमेल के द्वारा ही करते है। अत : इसकी सुरक्षा का धयान रखना भी हमारा ही काम है  क्योकि जहाँ इन्टरनेट से कई प्रकार की सुविधा आसानी से घर बैठे  प्राप्त होती है वही इसके दुरूपयोग की भी संभावना भी बहुत अधिक होती है।

इन्टरनेट Users का एक बड़ा वर्ग Hackers का होता है जो हमेशा इसी ताक में रहते है की कैसे किसी का प्राइवेट जानकारी प्राप्त करके उससे खुद का का फायदा एवं दूसरो को हानि पहुँचा सके।

एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 5 लाख से अधिक ईमेल password हैक किये जा चुके है।

कैसे जाने की किसी ईमेल का पासवर्ड Hack है या नहीं

अब प्रश्न यह है की यह कैसे पता चले की किसी ईमेल  का पासवर्ड हैक किया जा चूका है।

इसके लिए आपको अपने ईमेल अकाउंट का सावधानी एवं सूक्ष्मता से निरीक्षण करना होगा।

इसके लिए निम्न बातों पर ध्यान दे …

  • अगर आप अपने ईमेल account को सही पासवर्ड के द्वारा नहीं खोल पा रहे है।
  • अपने ईमेल Account के Sent folder मे देखे की कोई मेल आपकी जानकारी के बिना तो कहि Sent नहीं हुआ है।
  • अपने deleted मेल के folder की जांच करे की कोई मेल आपकी जानकारी के बिना तो Delete नहीं हुआ है।
  • अपने ईमेल के Account Section में जाकर अपने Last Login के date & Time की जाँच करे।
  • Ø अपने ईमेल के Account Section में जाकर अपने Logins के I.P. Adresses की जाँच करे। आप इन I.P. Adresses की जाँच अपने IPS(Internet Service Provider) के I.P. Adresses से मिलाकर कर सकते है। आप इन I.P. Adresses की जाँच http://whatismyipaddress.com/ip-lookup वैबसाइट के द्वारा कर सकते है।

अगर उपरोक्त बातों की जाँच करने के बाद अगर आपको लगता है की आपका ईमेल Account को आपके अतिरिक्त किसी अन्य ने प्रयोग किया है तो आपका ईमेल Account Hack किया जा चुका है।

shouldichangemypassword.com

should ichange my password

https://shouldichangemypassword.com/ एक ऐसी वेबसाइट है जिससे आसानी से यह पता लगाया जा सकता है की किसी ईमेल का पासवर्ड हैक हुआ है अथवा नहीं।

उपरोक्त Image के अनुसार इसपर जानकारी प्राप्त करने के लिए ईमेल का सिर्फ I.D. इंटर करने से यह पता चल जाता है की आपका ईमेल पासवर्ड सुरक्षित है अथवा नहीं। यह सेवा पूर्ण रूप से फ्री है।

PDF फाइल को कैसे एडिट करे ?….

PDFफाइलक्याहै?

PDF फाइल का निर्माण Adove कंपनी ने किया है। इसका निर्माण 1993 ई. में किया गया था। PDF, Portable Document Format  का संछिप्त रूप है।

अपने आकारमेंछोटाहोने एवं Read Only फाइल  (जिससे यह आसानी से Edit नहीं होता है।)  होने के कारण यह फाइल Format बहुत ही लोकप्रिय है ।

PDFफाइलकैसेएडिटकरे?

पीडीऍफ़ फाइल को निम्न कई प्रकार से एडिट किया जा सकता है….

  • ऑफलाइन
  • ऑनलाइन
  • Source file को Change करके
  • फाइल Format Change करके

1.ऑफलाइन (Offline)

इस प्रकार में मुख्य रूप से Software के प्रयोग से PDF फाइल को एडिट किया जाता है।

ये Software दो प्रकार के हो सकते है।

  1. 1.   Paid Software

इनमे मुख्य रूप से

  • Adobe Acrobat
  • Nitro PDF , इत्यादि आते है. जिनको खरीद के प्रयोग किया जा सकता है ।
  1. 2.  Free Software.

पीडीऍफ़ फाइल को एडिट करने के लिए कई प्रकार के free सॉफ्टवेर भी उपलब्ध है जिन्हें Internet द्वारा आसानी से Download एवं Install किया जा सकता है।

ऐसे Software में ..

PDF 24 Creator डाउनलोड करने के लिए यहाँ  क्लिक करे।

 

PDFILL PDF Editor डाउनलोड करने के लिए यहाँ  क्लिक करे।

 

 

Free PDF Editor डाउनलोड करने के लिए यहाँ  क्लिक करे।

 

 

Apache Open office डाउनलोड करने के लिए यहाँ  क्लिक करे।

Apache Open office के द्वारा हम पीडीऍफ़ फाइल के Text, Image एवं ग्राफिक्स इत्यादि को आसानी से Edit कर सकते है।

PDF एडिट करने के लिए इसका प्रयोग PDF Import Extention के साथ किया जाता है।

PDF Import Extention डाउनलोड करने के लिए यहाँ  क्लिक करे।

यह एक Advanced PDF Editor है।

 

2.ऑनलाइन (Online)

पीडीऍफ़ फाइल को ऑनलाइन भी Edit किया जा सकता है .कई Website PDF फाइल को सीधे अपने Website पर Uplode कर के उन्हें Edit करने की सुविधा प्रदान करती है।

इस प्रकार की वेबसाइट में pdfescape.com का नाम प्रमुख है जहा आप अपने PDF फाइल को सीधे Uplode एवं Edit कर सकते है।

 

3.Source file को Change करके

PDF फाइल के Source फाइल में बदलाव करके भी PDF फाइल को Edit किया जा सकता है है इसके लिए भी कई प्रकार के Software उपलब्ध है जिन्हें प्रयोग करके PDF फाइल के Source फाइल में बदलाव किया जा सकता है।

 

4.फाइल Format Change करके

PDF फाइल को  MS Word अथवा किसी अन्य आसानी से Edit होने वाले फॉर्मेट में बदल कर भी आप पीडीऍफ़ फाइल को Edit कर सकते है। इसमें फाइल को Edit करने के बाद उसे फिर से PDF में Change कर के प्रयोग किया जा सकता है।

इस सुविधा का प्रयोग ऑनलाइन तथा ऑफलाइन दोनों प्रकार से किया जा सकता है।

इत्यादि का प्रयोग कर के पीडीऍफ़ फाइल को ऑनलाइन आसानी से MS Word में Change किया जा सकता है।