भेदभाव के विरुद्ध महिला अधिकार ( Discrimination against women’s rights)

प्रस्तावना (Introduction)

आज भी हमारे समाज में महिलाओं से भेदभाव जारी है। सच्चाई यही है चाहे हम जितना भी विकसित और आधुनिक होने का दावा क्यों न कर लें परन्तु हमारा समाज आज भी महिलाओं के सशक्तिकरण से खौफ खाता है। दुनियां के प्रमुख निर्णायक जगहों पर महिलाओं की गिनती न के बराबर है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो टॉप की 500 कम्पनियाँ हैं उनमे सिर्फ 10% महिलाएं ही वरिष्ठ प्रबंधक है।

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दरअसल कम पुरुष ऐसे हैं जो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने को तैयार हैं। लोग बहुत होशियारी से महिलाओं के प्रति भेदभाव को किसी न किसी रूप में जारी रख रहे हैं। आम लोगों की तो बात छोड़ ही दे नारीवादी कार्यकर्ता, लेखक और विचारकों की निजी जिन्दगी भी उत्साहवर्धक उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते।

आज महिलाएं पुरुष के कंधे से कन्धा मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन लिंग आधारित भेदभाव अब भी मौजूद है। नौकरियों में महिलाओं का प्रमोशन रोक दिया जाता है क्योंकि अब उसकी शादी होने वाली है।  महिलाओं को कार्य स्थल पर सेक्सुअल पॉलिटिक्स का भी सामना करना पड़ता है। सबसे पावरफुल देश के सबसे पावरफुल पद के लिए चुनाव लड़ रही हिलेरी क्लिंटन को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियां के लगभग हर देश में महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।  ऐसा इसके बावजूद हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र के सभी 185 सदस्य देशों ने यह वादा किया था की 2005 तक वे उन सभी कानूनों को ख़त्म कर देंगे जो महिलाओं से भेदभाव करता है।

भेदभाव क्या है?

औचित्य या न्याय का विचार त्याग कर किसी एक पक्ष को वरीयता या सहानुभूति अथवा समर्थन देना भेदभाव कहलाता है। सरल शब्दों में हम इस प्रकार भेदभाव को परिभाषित करने का प्रयास कर सकते हैं कि- भेदभाव या विभेदन किसी व्यक्ति या अन्य चीज के पक्ष में या उस के विरुद्ध, गुणों-अवगुणों को न देखते हुए, इसके किसी वर्ग, श्रेणी या समूह का सदस्य होने के आधार पर, भेद करने की प्रक्रिया को कहते हैं।

भेदभाव में अक्सर किसी व्यक्ति को केवल उसके वर्ग के आधार पर अवसरों, स्थानों, अधिकारों, और अन्य चीजो से वंचित कर दिया जाता है। भेदभाव वाली परम्पराए और नीतियां, विचार कानून और रीतियाँ बहुत से समाजो, देशो, और संस्थाओ में है। धार्मिक रूप से कट्टर समाजों में यह ज्यादा देखने को मिलता है।

महिलाओ के साथ बरते जाने वाली भेदभाव के तरीके, प्रकार, तथा स्थान

  • वचन द्वारा

  • व्यव्हार द्वारा

  • अवसरों में कमी

  • धार्मिक क्रियाकलाप

  • समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि

  • भावनात्मक

  • मानसिक

  • आर्थिक निर्भरता

  • प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण

  • नैतिक बंधन

वचन द्वारा 

सबसे अधिक उपयोग में लाया जाने वाला तथा क्रूरतापूर्ण तरीका वचन है। जिसके माध्यम से हम सिर्फ क्रूरता ही नहीं करते बल्कि वक्त-बेवक्त महिलाओ को यह अहसास कराते हैं कि वो कितनी छुद्र और दुर्बल है। अपने बोलचाल की शैली तथा प्रयुक्त शब्दावली के माध्यम से आये दिन भेदभावमूलक बर्ताव करते है। हमारा समाज इतना असंवेदनशील है की उसे  इस गम्भीर तरीके पर गौर करना भी औचित्यपूर्ण नहीं लगता।  यहाँ तक की स्त्री स्वयं भी इसे दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार करती चली जाती है। यह इतना स्वीकार्य और सरल हो गया है की उन्हें इस बारे में कुछ भी अजीब नहीं लगता।  इस तरह की समस्या विकाशशील देशो एवं धर्म भीरु समाज जैसे की एशियाई, भारतीय और मुस्लिम समाजों में ज्यादातर देखने को मिलता है।

व्यवहार द्वारा

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से हमेशा स्त्री पुरुष में भेदभाव किया जाता है। हमने तय कर रखे हैं की स्त्री और पुरुष के पहनावे क्या होंगे ? उनके व्यहार कैसे होंगे ? आदि।

अवसर की कमी- 

स्त्री किसी भी तरह से योग्यता में पुरुष से कमतर नहीं है बल्कि कई जगहों पर तो उसने अपने को बढ़कर साबित किया है। स्त्री के प्रति भेदभाव का सबसे बड़ा तरीका जो समाज में देखने को मिलता है वह है उनके लिए अवसर की उपलब्धता में कमी, उनके लिए क्षेत्रों को सिमित किया जाना। उनके उम्र, शारीरिक एवम मानसिक क्षमता, आदि पर पुरुष को वरीयता दिया जाना।

धार्मिक क्रियाकलाप 

धार्मिक अनुष्ठान में पुरुष को प्राथमिकता दिया गया है। लगभग हर धर्म के धार्मिक कृत्यों में स्त्री को द्वितीय स्थान प्रदान किया गया है।  हिन्दू धर्म में स्त्री न तो मुखाग्नि दे सकती है, न ही श्राद्ध कर सकती है, और न ही  पुरुष के बिना कोई मुख्य यज्ञ संपन्न कर सकती है। ‘पुत्र के बिना नरक से मुक्ति संभव नहीं’ की अवधारणा है। ऐसा ही हाल कमोबेश सभी धर्मो का है। मुस्लिम समाज में स्त्री की स्थिति और भी दयनीय है।

समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि 

समाज में महिलाओं को परंपरागत रूप से कमजोर जाति-वर्ग के रूप में माना जाता है। वह पुरुष के अधीन होती है।लवह घर और घर के बाहर दोनों जगह शोषित, अपमानित, आक्रमित, और भेदभाव से पीड़ित होती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर आधारित यह समाज, पुत्र के जन्म पर खुशियां मनाता है और पुत्री को भार स्वरूप समझता है। भारतीय और एशियाई समाजों में इसके गंभीर रूप देखने को मिलते हैं। बालविवाह, शती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, तिहरा तलाक, बहु विवाह, आदि जैसी प्रथाएं स्त्री के शोषण, भेदभाव एवं उनके प्रति क्रूरता के मूल कारक हैं।

भावनात्मक

 स्त्री के प्रति शोषण अथवा भेदभाव की बात करते वक्त ज्यादातर लेखक एवं विचारक आर्थिक और सामाजिक पक्ष पर ही केन्द्रित रहते है। जबकि स्त्री का एवं उसके प्रति भावनात्मक पक्ष भी भेदभाव बरतने का एक तरीका हो सकता है। भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव या शोषण तब होता है जब हम अपने शब्दों या व्यव्हार के माध्यम से स्त्री को आहात करे या उनके ह्रदय को ठेस पहुंचाएं। उदाहरण के लिये स्त्री को ताने मरना, उसकी सुंदरता को लेकर मज़ाक उड़ाना, उसकी जाती, लिंग, या उम्र आदि व्यक्तिगत बातों को लेकर मज़ाक उड़ाना, या उसकी उपेक्षा करना आदि बहुत से रास्ते हैं जिसके द्वारा भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव को विचार में ला सकते हैं।

मानसिक

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से मन के तल पर स्त्री को ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण देते है जिससे की वह पितृसत्तात्मक समाज का एक उपकरण मात्र बन कर रह जाय। जिससे की वह पुरुष की सत्ता को कभी चुनौती न दे पाए। हमारे समाज ने स्त्री की गुलामी को सुनिश्चित करने के हर संभव तरीके ईजाद कर रखे है।

आर्थिक निर्भरता 

स्त्री को आर्थिक रूप से निर्बल रखा गया है ताकि वह पुरुष से कमजोर ही रहे और पुरुष का उस पर पकड़ बना रहे। यही कारण है कि हमारा समाज आर्थिक क्षेत्र में पुरुष को प्रेरित करता है जबकि महिला को हतोत्साहित करता है। विकसित देशों में महिलाओं का कामकाजी होना स्वीकार्य है।  परन्तु भारतीय, एशियाई, और अरब समाजों में नौकरी आदि में कामकाजी महिलाओं को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण 

पुरुष ने हमेशा से ही महिलाओं को अपने अधीन रखना चाहा है. उसको एक संपत्ति मानकर  उसका स्वामी बनना चाह है. स्त्री को नियंत्रित कर उस पर स्वामित्व स्थापित करने का दृष्टिकोण  ही प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण कहलाता है। जब तक यह दृष्टिकोण बना रहेगा तब तक समाज में स्त्रियों से भेदभाव जारी रहेगा। वैश्विक चुनौतियों के इस युग में महिलाओं का पेशेवर होना, आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बराबरी का अवसर दिया जाना यह समय की मांग है। परंतु पितृसत्तात्मक समाज का प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण स्त्री को यह स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं है।

नैतिक बंधन– 

स्त्री के ऊपर अनेक प्रकार के नैतिक बंधनों की बेड़ियाँ डाल दी जाती है। जबकि पुरुष स्त्री के अपेक्षा ज्यादा स्वतंत्र होते हैं। उदाहरण के लिए मुस्लिम समाजों में बहु विवाह और तिहरा तलाक की प्रथा ही ले लें। स्त्री के लिए पर्दा प्रथा अनिवार्य है। स्त्री को पूरा शरीर ढक कर रखना होगा चाहे गर्मी कितनी भी क्यों न हो। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जिसके द्वारा स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि स्त्री के ऊपर अत्यधिक नैतिक बाध्यताएं आरोपित हैं। जबकि पुरुष को अत्यधिक स्वतंत्रता प्राप्त है।

भेदभाव के कारण महिलाओं को होने वाली परेशानियां

आज विश्व में नारीवाद और उसके संरक्षण के आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में तीव्र प्रसार हो रहा है। बावजूद इसके स्त्रियों के भाग्य का निर्णय अभी भी उसके पति और परिवार के हांथों में है।वे अपने व्यवहार, विवाह, परिवार, यौन सम्बन्ध तथा अन्य बातों के सम्बन्ध में स्वतंत्र नहीं है। स्त्री अपने कार्य को कितनी भी दक्षता से क्यों न करे पुरुष उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाँथ से चूकता नहीं है। इन भेदभाव और शोषण वादी मानसिकता के कारण महिलाओं को क्रूरता, हिंसा, यौन अत्याचार, शारीरिक और मानसिक शोषण, स्वस्थ्य जनित समस्याएं, आर्थिक विपन्नता, आत्मसम्मान को ठेस, आदि परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दुनिया के हर कोने में स्त्री के प्रति हिंसा की जा रही है चाहे वह विकासशील देश हों या विकसित, या फिर तथाकथित सभ्य और संपन्न राष्ट्र हों। स्त्री के प्रति अत्याचार और भेदभाव में सब भागीदार हैं। स्त्री  को शिक्षा का सामान अवसर न दिए जाने के पीछे समाज का षड़यंत्र है की उन्हें अशिक्षित रखो तभी वह गुलाम रहेगी।

स्त्री की समस्याओं को लेकर विश्व की चिंता –

हमारा विश्व ज्यों-ज्यों आगे की तरफ बढ़ रहा है वह अपने प्राचीन रिवाजों से उबरता जा रहा है। रफ़्तार भले ही कम हो परंतु सुधारवादी प्रयास जारी है। इसी कारण से जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र के जन्म के बाद मानवाधिकारों की उद्घोषणा 1948 में आया। तब से लेकर अब तक UN लगातार मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयास में प्रगति कर रहा है। इसी प्रयास के अन्तर्गत स्त्री के समस्याओं पर हमारे विश्व के स्थापित सरकारों ने गंभीरता दिखाई तथा स्त्री के मानवाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कदम भी उठाये गए। 25 नवम्बर को ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मिटाओ’ का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1999 में मान्यता दी ताकि लोगों में स्त्री अधिकारों को लेकर जागरूकता पैदा किया जा सके। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र द्वारा CEDAW पारित किया गया ताकि स्त्री के प्रति सभी तरह के भेद भाव का उन्मूलन किया जा सके।

महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय

समय समय पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों की रक्षा एवं विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न नियमों एवं अभिसमयो को पारित किया गया है। इनमे से कुछ निम्न है..

  1. Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW).
  2. Optional Protocol to the Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women.
  3. Universal Declaration of Human Rights
  4. International Convention on Civil and Political Rights
  5. International Convention on Social, Economic, and Cultural Rights
  6. Committee against Torture
  7. Conventions against Torture

Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW)-

संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18 दिसम्बर, 1979 को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। इसके दसवीं वर्षगांठ तक 100 देशों ने इसे स्वीकार कर लिया था। 1946 में संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा एक अंग का गठन किया गया था जिसका कार्य महिलाओं के अधिकार को बढावा देना और उनकी स्थिति पर नजर रखना था। 30 वर्षों के अथक परिश्रम के फलस्वरुप इस अंग का यह महान कार्य एक अभिसमय के रूप में जन्म ले सका। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है। इस अभिसमय का मुख्य लक्ष्य स्त्री और पुरुष के बिच समानता के अधिकार, मनुष्य की गरिमा, उसके मूल्य, एवं मनुष्य के मौलिक अधिकार में विश्वास को पुनः बहाल करना है।

“CEDAW” के प्रमुख प्रावधान- 

इस अभिसमय की संरचना 6 भागों में है तथा इसमें कुल 30 अनुच्छेद हैं।

Part I (Art-1 to 6)- यह भाग भेदभाव के निराकरण, सेक्स रुढीता और सेक्स के अवैध व्यापर पर केन्द्रित है।

Part II (Art 7to 9)- यह भाग महिलाओं के लिए राजनैतिक, सार्वजानिक क्षेत्र, प्रतिनिधित्व, और राष्ट्रीयता के मामले में अधिकारों की रुपरेखा प्रस्तुत करती है।

Part III (Art 10 to 14)- यह भाग स्त्री के सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों जैसे की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थय आदि पर केंद्रित है। यह भाग ग्रामीण महिलाओं के संरक्षण पर विशेष ध्यान देती है।

Part IV (Art 15 & 16)- विवाह एवं पारिवारिक जीवन में कानून की नजरों में समानता के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है।

Part V (Art 17 to 22)- राज्य पक्षकारों के रिपोर्टिंग की प्रक्रिया के सम्बन्ध में नियम के साथ-साथ एक समिति का भी गठन किया गया है जो महिलाओं के प्रति भेदभाव के उन्मूलन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उठाएगी।

Part VI (Art 23 to 30)- इस भाग में अभिसमय का अन्य संधियों पर क्या प्रभाव होगा तथा इसका राज्य पक्षकार और उसके प्रशासन पर क्या प्रभाव होगा इसके बारे में उल्लेख किया गया है।

“CEDAW” के तहत महिला अधिकार से संबंधित प्रावधान

CEDAW के Part I से लेकर Part IV ( Art. 1 से Art.16 तक ) महिला अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान दिए कए है जोकि निम्न प्रकार से है।

Art 1 – स्त्री के प्रति भेदभाव को परिभाषित किया गया है।

Art 2- इस अनुच्छेद के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है की अनुमोदन करने वाले पक्षकार यह सुनिश्चित करेंगे की उनके घरेलु कानून में लैंगिक समानता स्थापित हो तथा उनके कानूनों में से भेदभावपूर्ण प्रावधान निरस्त हो। महिलाओं के लिए ट्रिब्यूनल की स्थापना किया जाये। उनके खिलाफ भेदभाव मिटाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु समुचित कदम उठाया जाय।

Art 3- राजनैतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के स्त्री-पुरुष में समानता के आधार पर मानवाधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 4- मातृत्व के लिए विशेष सुरक्षा भेदभाव के अंतर्गत प्रगणित नहीं होगा।

Art 5- बच्चों की  परवरिश में स्त्री एवं पुरुष की समान जिम्मेदारी को निर्धारित अथवा मान्यता दिया जाय।

Art 6- राज्य पक्षकार महिलाओं की तस्करी, वेश्यावृति, और शोषण के सभी रूपों के उन्मूलन के लिए समुचित उपाय करें।

Art 7- राजनैतिक और सामाजिक जीवन में मतदान तथा सरकार में भागीदारी हेतु समानता के अधिकार की गारन्टी सुनिश्चित किया जाय साथ ही गैर सरकारी संगठनों एवं संघों में भी उनके समानता के अधिकार को गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 8- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सरकार का प्रतिनिधित्व करने और अंतराष्ट्रीय संगठनों में काम करने हेतु अवसर उपलब्ध कराने की गारन्टी प्रदान करना।

Art 9- राज्य पक्षकार महिलाओ को अपने और अपने बच्चों की राष्ट्रीयता को प्राप्त करने, बदलने, और बनाये रखने में पुरुष के बराबर अधिकार प्रदान करने हेतु बाध्य होंगे।

Art 10- महिला छात्रों को भी शिक्षा का समान अवसर प्राप्त होगा तथा सहशिक्षा को बढ़ावा दिया जायेगा। खेल, छात्रवृति, और अनुदान में स्त्री को बढ़ावा दिया जायेगा।

Art 11- इस अनुच्छेद के अंतर्गत स्त्री को समान कार्य के लिए समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, अवकाश और मातृत्व अवकाश का अधिकार प्रदान किया गया है। मातृत्व, गर्भावस्था या विवाह की स्थिति में बर्खास्तगी को निषिद्ध किया गया है।

Art 12- राज्य पक्षकार का यह दायित्व है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं से सम्बंधित सभी तरह के भेदभाव का उन्मूलन किया जाय। महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ परिवार नियोजन से सम्बंधित उचित कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार को सौपा गया है।

Art 13- स्त्री के आर्थिक व सामाजिक जीवन विशेषकर पारिवारिक लाभ, बैंक, ऋण, बंधक, वितीय ऋण, खेल, मनोरंजन गतिविधियों सहित सभी क्षेत्र में समानता के अधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 14- यह अनुच्छेद ग्रामीण महिलाओं और उनके समस्याओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। विकास कार्यक्रमों में भाग लेने, सभी सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा लेने, स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा का उपयोग, कृषि ऋण का उपयोग आदि सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार पर होने का प्रावधान इस अनुच्छेद के अन्तर्गत किया गया है।

Art 15- विधि के समक्ष पुरुष के बराबर समानता का अधिकार, संचरण एवं निवास का अधिकार प्रदान किया जायेगा।

Art 16- विवाह और परिवार से सम्बंधित सभी मामलों में भेदभाव का उन्मूलन, पति चुनने का अधिकार, परिवार का नाम चुनने का अधिकार, बच्चों की संख्या तय करने का अधिकार, आदि प्रदान किया गया है।

आलोचनात्मक समीक्षा

इस अभिसमय की आलोचना भी किया जा सकता है जैसे यह अभिसमय एक दन्त विहीन अभिसमय है जिसके पास अनुशास्ति की शक्ति नहीं है और न ही विभिन्न राज्यों के बीच कोई सामंजस्य स्थापित करने की बात करता है।

सबसे बड़ी कमी इस अभिसमय की यह है कि यह अभिसमय महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के समस्या के समाधान संबंधित नियम को तो उल्लेखित करता है। लेकिन इस अभिसमय के सदस्य के रुप मे किसी महिला सदस्य की बात नहीं करता है।

इस अभिसमय के अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि इस समिति के सदस्य उच्च नैतिक हैसियत एवं क्षमता वाले होंगे। इसमें उच्च नैतिक हैसियत को परिभाषित नहीं किया गया है।

Civil और Political Convention के प्रावधान से इस अभिसमय की एक खामी और है यह अभिसमय मानवाधिकार समिति से भी कमजोर समिति का निर्माण करता है क्यूंकि इसमें राज्यों के मध्य संवाद स्थापित करने की बात नहीं कही गई है।

इस अभिसमय की एक और तरीके से भी आलोचना की जा सकती है।—

विश्व में बहुत से ऐसे देश है जहाँ महिलाओं को कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है अगर कुछ अधिकार दिए भिगाए है तो वह अत्यंत सिमित है। यह अभिसमय ऐसे राज्यों के लिए कोई भी बाध्यकारी उपबन्ध नहीं कर पाया है।

यह अभिसमय महिलाओं के लिए समान दर्जा की बात तो करता है परन्तु विश्व के बहुत से ऐसे राष्ट्र है जहाँ की महिलाओं को यह पता ही नहीं है कि उन्हें सम्पति या अन्य सामुदायिक मसले में क़ानूनी रूप अधिकार मिला है। यह अभिसमय ऐसी महिलाओं के लिए कोई सुझाव नहीं देता है।

मूल्यांकन

जैसा की  हम जानते है संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18  दिसम्बर, 1979  को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। समय के साथ साथ इसके सदस्य देशों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती गई और इसका विस्तार कई देशों में हो गया। महिलाओं की उन्नति के लिए इस अभिसमय में कई प्रावधान है जिससे उनको समाज मे बराबरी का दर्जा प्राप्त हो सके एवं उनके साथ हो रहे भेदभाव को कम किया जा सके।

परन्तु वास्तविकता यह है कि आज के वैश्विक समाज में कोई भी किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून को बिना प्रयाप्त बाध्यकारी उपबन्ध के सामान रूप से लागु कर पाना बहुत ही मुश्किल है। “CEDAW” की स्थिति भी ऐसी ही है.यह अभिसमय भी कई प्रकार की कमियों से युक्त है जो इसके पूर्ण रूप से लागु होने में बाधक है। इसप्रकार यह अभिसमय आजके समय में उतना प्रभावी नहीं है जितना इसके गठन करते समय अपेक्षा की गई थी।

लेकिन इन सबके बावजूद भी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है।

 

 

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One Response

  1. December 19, 2016

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