आल्हा- प्रेमचंद(Alha Hindi Story By Premchand)

आल्हा- प्रेमचंद(Alha Hindi Story By Premchand) १. आल्हा का नाम किसने नहीं सुना। पुराने जमाने के चन्देल राजपूतों में वीरता और जान पर खेलकर स्वामी की सेवा करने के लिए किसी राजा महाराजा को भी यह अमर कीर्ति नहीं मिली। राजपूतों के नैतिक नियमों में केवल वीरता ही नहीं थी बल्कि अपने स्वामी और अपने […]

खुशी हमारे मन में होती है…

जंगल में एक कौआ रहता था जो अपने जीवन से पूर्णतया संतुष्ट था।लेकिन एक दिन उसने बत्तख देखी और सोचा, “यह बत्तख कितनी सफ़ेद है और मैं कितना काला हूँ। यह बत्तख तो संसार की सबसे ज़्यादा खुश पक्षी होगी।” उसने अपने विचार बत्तख से बतलाए। बत्तख ने उत्तर दिया, “दरसल मुझे भी ऐसा ही […]

महिमा अपरम्पार बनारस

  कोई नहीं समझ पाया है, महिमा अपरम्पार बनारस। भले क्षीर सागर हों विष्णु, शिव का तो दरबार बनारस।।                               हर-हर महादेव कह करती, दुनिया जय-जयकार बनारस।                             […]

छोड़िये बीती बातों का गम क्या करे…

अपनी आँखों को अब और नम क्या करे छोड़िये बीती बातों का गम क्या करे।।   इसलिए हमने उनका यकीं कर लिया खा रहे थे क़सम पे क़सम क्या करे।।   ये तो सूरज को ख़ुद सोचना चाहिए धुप में जल रहे थे क़दम क्या करे।।   मौत आगे भी है मौत पीछे भी है […]

पैसे की थैली किसकी (Akbar-Birbal)

  दरबार लगा हुआ था। बादशाह अकबर राज-काज देख रहे थे। तभी दरबान ने सूचना दी कि दो व्यक्ति अपने झगड़े का निपटारा करवाने के लिए आना चाहते हैं। बादशाह ने दोनों को बुलवा लिया। दोनों दरबार में आ गए और बादशाह के सामने झुककर खड़े हो गए। ‘कहो क्या समस्या है तुम्हारी?’ बादशाह ने […]

मैं आपका नौकर हूं, बैंगन का नहीं (Akbar-Birbal)

एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। फले-फूले बाग को देखकर बादशाह अकबर बहुत खुश थे। वे बीरबल से बोले, ‘बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!’ इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं। हां! महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह […]

विद्वत्ता का घमंड

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था I शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था Ι अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया Ι उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा Ι उनसे बड़ा […]

विलासी (Vilasi by Sharat Chandra)

पक्का दो कोस रास्ता पैदल चलकर स्कूल में पढ़ने जाया करता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ, दस-बारह जने हैं। जिनके घर देहात में हैं, उनके लड़कों को अस्सी प्रतिशत इसी प्रकार विद्या-लाभ करना पड़ता है। अत: लाभ के अंकों में अन्त तक बिल्कुल शून्य न पड़ने पर भी जो पड़ता है, उसका हिसाब लगाने के […]

अनुपमा का प्रेम (Anupama ka prem by Sharat Chandra)

ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। […]

काबुलीवाला- रवीन्द्र नाथ टैगोर (Kabuliwala By Rabindranath Tagore)

मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, “बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।” मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। “देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश […]

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