प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna)

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna) की शुरुआत अप्रैल 2015 में भारत सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण हेतु किया गया था। इस योजना का उद्देश्य  गरीबों के कल्याण के लिए, भारत सरकार द्वारा गरीबों के हित एवं कल्याण से सम्बंधित पूर्ववर्ती योजनाओं को सही प्रकार से लागु करना है। इसके लिए भारत सरकार ने एक कार्यशाला का भी आयोजन किया था जिससे लोगो को इस बारे में जागरूक किया जा सके।  इसी क्रम में नवम्बर 2016 में भारत सरकार द्वारा इनकम टैक्स में संसोधन किया गया है जिससे की गरीबों से सम्बंधित कल्याणकारी योजनाओ को सुचारू रूप से  प्रभावी करने हेतु अतरिक्त धन का प्रबंध किया जा सके।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ कौन उठा सकता है?

यह योजना गरीबों के कल्याण हेतु है। अत: कोई भी भारतीय नागरिक जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है इस योजना का लाभ उठा सकता है। इसके लिए अगर वह ग्रामीण क्षेत्र का है तो ग्राम-पंचायत तथा शहरी क्षेत्र का है तो नगरपलिका से संपर्क कर विस्तृत जानकारी ले सकता है।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna) का विस्तार

भारत सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली से 29 नवम्बर 2016 को इनकम टैक्स एक्ट में संशोधन के लिये एक विधेयक प्रस्तावित किया ।जिसके द्वारा 30 दिसम्बर 2016 तक जो व्यक्ति जिसके पास भी कालाधन या अवैधानिक तरीके से कमाई  गयी सम्पति है । जिस पे इनकम टेक्स नहीं दिया गया  है अगर अपने धन का स्वं खुलासा करता है तो उस धन पे 49.9 % (लगभग 50%) का टेक्स लगेगा । बाकि की 25% धनराशी  को 4 वर्षो के लिये प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में जमा करा दिया जायेगा । इसके साथ ही साथ उस धनराशी पर कोई ब्याज नहीं दिया जायेगा । आगामी 4 वर्षो तक यह धनराशी फ्रीज़ अवस्था में रहेगी| यहाँ फ्रीज़ अवस्था से तात्पर्य ये है की वह व्यक्ति उस धन का उपयोग नहीं कर पायेगा । 4 वर्षो के बाद वह धन राशी उस व्यक्ति की वापस दे दि जाएगी| बाकि की 25% धनराशी का उपयोग वह व्यक्ति  तत्काल कर सकता है।

एक उदहारण के माध्यम से हम इसे आसानी से समझ सकते है। मान लीजिये की किसी व्यक्तिके पास कालाधन के रूप में 100 रूपये है-

  1.  इस 100 रूपये पर 49.9 %( लगभग 50% का टेक्स लग  जायेगा i.e. 100 का 50% = 50 रूपये टैक्स में चला जायेगा
  2. उस 100  रूपये का 25% , प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में चला जायेगा (100 का25 % = 25 रूपये)
  3. और 100 रूपये का बाकि बचा हिस्सा 25 रूपये उस व्यक्ति को तुरंत वापस दे दिया जायेगा

साथ ही साथ प्रस्तावित संशोधनों में यह भी प्रावधान है कि अगर 30 दिसम्बर 2016 तक किसी व्यक्ति अपना काला धन घोषित नहीं किया है  और इनकम टैक्स विभाग को उस धन का पता लग जाता है तो  उस स्थिति में उस सम्पूर्णराशी का 85% टैक्स और जुर्माने के रूप में वसूला जायेगा।

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प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना उपयोगिता

किसी योजना को बनाने और लागु करने के लिये बहुत अधिक मात्रा में धन  की आवश्कता होती है। खास तौर पर गरीबो के लिये बनायीं गयी योजना में । इस योजना में एकत्रित धन का उपयोग सरकार भारत के गरीबो के लिये नयी योजनायें बनाने में करेगी जिससे देश की गरीब जनता के जीवन स्तर को उपर उठाने में मदद मिलेगी, साथ ही साथ उनके लिये भोजन , स्वच्छ पानी ,रहने के स्थान और स्वास्थ्य संबधित आवश्कता की पूर्ति की जा सकती है। ये भारत सरकार का एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है।

भेदभाव के विरुद्ध महिला अधिकार ( Discrimination against women’s rights)

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प्रस्तावना (Introduction)

आज भी हमारे समाज में महिलाओं से भेदभाव जारी है। सच्चाई यही है चाहे हम जितना भी विकसित और आधुनिक होने का दावा क्यों न कर लें परन्तु हमारा समाज आज भी महिलाओं के सशक्तिकरण से खौफ खाता है। दुनियां के प्रमुख निर्णायक जगहों पर महिलाओं की गिनती न के बराबर है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो टॉप की 500 कम्पनियाँ हैं उनमे सिर्फ 10% महिलाएं ही वरिष्ठ प्रबंधक है।

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दरअसल कम पुरुष ऐसे हैं जो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने को तैयार हैं। लोग बहुत होशियारी से महिलाओं के प्रति भेदभाव को किसी न किसी रूप में जारी रख रहे हैं। आम लोगों की तो बात छोड़ ही दे नारीवादी कार्यकर्ता, लेखक और विचारकों की निजी जिन्दगी भी उत्साहवर्धक उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते।

आज महिलाएं पुरुष के कंधे से कन्धा मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन लिंग आधारित भेदभाव अब भी मौजूद है। नौकरियों में महिलाओं का प्रमोशन रोक दिया जाता है क्योंकि अब उसकी शादी होने वाली है।  महिलाओं को कार्य स्थल पर सेक्सुअल पॉलिटिक्स का भी सामना करना पड़ता है। सबसे पावरफुल देश के सबसे पावरफुल पद के लिए चुनाव लड़ रही हिलेरी क्लिंटन को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियां के लगभग हर देश में महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।  ऐसा इसके बावजूद हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र के सभी 185 सदस्य देशों ने यह वादा किया था की 2005 तक वे उन सभी कानूनों को ख़त्म कर देंगे जो महिलाओं से भेदभाव करता है।

भेदभाव क्या है?

औचित्य या न्याय का विचार त्याग कर किसी एक पक्ष को वरीयता या सहानुभूति अथवा समर्थन देना भेदभाव कहलाता है। सरल शब्दों में हम इस प्रकार भेदभाव को परिभाषित करने का प्रयास कर सकते हैं कि- भेदभाव या विभेदन किसी व्यक्ति या अन्य चीज के पक्ष में या उस के विरुद्ध, गुणों-अवगुणों को न देखते हुए, इसके किसी वर्ग, श्रेणी या समूह का सदस्य होने के आधार पर, भेद करने की प्रक्रिया को कहते हैं।

भेदभाव में अक्सर किसी व्यक्ति को केवल उसके वर्ग के आधार पर अवसरों, स्थानों, अधिकारों, और अन्य चीजो से वंचित कर दिया जाता है। भेदभाव वाली परम्पराए और नीतियां, विचार कानून और रीतियाँ बहुत से समाजो, देशो, और संस्थाओ में है। धार्मिक रूप से कट्टर समाजों में यह ज्यादा देखने को मिलता है।

महिलाओ के साथ बरते जाने वाली भेदभाव के तरीके, प्रकार, तथा स्थान

  • वचन द्वारा

  • व्यव्हार द्वारा

  • अवसरों में कमी

  • धार्मिक क्रियाकलाप

  • समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि

  • भावनात्मक

  • मानसिक

  • आर्थिक निर्भरता

  • प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण

  • नैतिक बंधन

वचन द्वारा 

सबसे अधिक उपयोग में लाया जाने वाला तथा क्रूरतापूर्ण तरीका वचन है। जिसके माध्यम से हम सिर्फ क्रूरता ही नहीं करते बल्कि वक्त-बेवक्त महिलाओ को यह अहसास कराते हैं कि वो कितनी छुद्र और दुर्बल है। अपने बोलचाल की शैली तथा प्रयुक्त शब्दावली के माध्यम से आये दिन भेदभावमूलक बर्ताव करते है। हमारा समाज इतना असंवेदनशील है की उसे  इस गम्भीर तरीके पर गौर करना भी औचित्यपूर्ण नहीं लगता।  यहाँ तक की स्त्री स्वयं भी इसे दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार करती चली जाती है। यह इतना स्वीकार्य और सरल हो गया है की उन्हें इस बारे में कुछ भी अजीब नहीं लगता।  इस तरह की समस्या विकाशशील देशो एवं धर्म भीरु समाज जैसे की एशियाई, भारतीय और मुस्लिम समाजों में ज्यादातर देखने को मिलता है।

व्यवहार द्वारा

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से हमेशा स्त्री पुरुष में भेदभाव किया जाता है। हमने तय कर रखे हैं की स्त्री और पुरुष के पहनावे क्या होंगे ? उनके व्यहार कैसे होंगे ? आदि।

अवसर की कमी- 

स्त्री किसी भी तरह से योग्यता में पुरुष से कमतर नहीं है बल्कि कई जगहों पर तो उसने अपने को बढ़कर साबित किया है। स्त्री के प्रति भेदभाव का सबसे बड़ा तरीका जो समाज में देखने को मिलता है वह है उनके लिए अवसर की उपलब्धता में कमी, उनके लिए क्षेत्रों को सिमित किया जाना। उनके उम्र, शारीरिक एवम मानसिक क्षमता, आदि पर पुरुष को वरीयता दिया जाना।

धार्मिक क्रियाकलाप 

धार्मिक अनुष्ठान में पुरुष को प्राथमिकता दिया गया है। लगभग हर धर्म के धार्मिक कृत्यों में स्त्री को द्वितीय स्थान प्रदान किया गया है।  हिन्दू धर्म में स्त्री न तो मुखाग्नि दे सकती है, न ही श्राद्ध कर सकती है, और न ही  पुरुष के बिना कोई मुख्य यज्ञ संपन्न कर सकती है। ‘पुत्र के बिना नरक से मुक्ति संभव नहीं’ की अवधारणा है। ऐसा ही हाल कमोबेश सभी धर्मो का है। मुस्लिम समाज में स्त्री की स्थिति और भी दयनीय है।

समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि 

समाज में महिलाओं को परंपरागत रूप से कमजोर जाति-वर्ग के रूप में माना जाता है। वह पुरुष के अधीन होती है।लवह घर और घर के बाहर दोनों जगह शोषित, अपमानित, आक्रमित, और भेदभाव से पीड़ित होती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर आधारित यह समाज, पुत्र के जन्म पर खुशियां मनाता है और पुत्री को भार स्वरूप समझता है। भारतीय और एशियाई समाजों में इसके गंभीर रूप देखने को मिलते हैं। बालविवाह, शती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, तिहरा तलाक, बहु विवाह, आदि जैसी प्रथाएं स्त्री के शोषण, भेदभाव एवं उनके प्रति क्रूरता के मूल कारक हैं।

भावनात्मक

 स्त्री के प्रति शोषण अथवा भेदभाव की बात करते वक्त ज्यादातर लेखक एवं विचारक आर्थिक और सामाजिक पक्ष पर ही केन्द्रित रहते है। जबकि स्त्री का एवं उसके प्रति भावनात्मक पक्ष भी भेदभाव बरतने का एक तरीका हो सकता है। भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव या शोषण तब होता है जब हम अपने शब्दों या व्यव्हार के माध्यम से स्त्री को आहात करे या उनके ह्रदय को ठेस पहुंचाएं। उदाहरण के लिये स्त्री को ताने मरना, उसकी सुंदरता को लेकर मज़ाक उड़ाना, उसकी जाती, लिंग, या उम्र आदि व्यक्तिगत बातों को लेकर मज़ाक उड़ाना, या उसकी उपेक्षा करना आदि बहुत से रास्ते हैं जिसके द्वारा भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव को विचार में ला सकते हैं।

मानसिक

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से मन के तल पर स्त्री को ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण देते है जिससे की वह पितृसत्तात्मक समाज का एक उपकरण मात्र बन कर रह जाय। जिससे की वह पुरुष की सत्ता को कभी चुनौती न दे पाए। हमारे समाज ने स्त्री की गुलामी को सुनिश्चित करने के हर संभव तरीके ईजाद कर रखे है।

आर्थिक निर्भरता 

स्त्री को आर्थिक रूप से निर्बल रखा गया है ताकि वह पुरुष से कमजोर ही रहे और पुरुष का उस पर पकड़ बना रहे। यही कारण है कि हमारा समाज आर्थिक क्षेत्र में पुरुष को प्रेरित करता है जबकि महिला को हतोत्साहित करता है। विकसित देशों में महिलाओं का कामकाजी होना स्वीकार्य है।  परन्तु भारतीय, एशियाई, और अरब समाजों में नौकरी आदि में कामकाजी महिलाओं को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण 

पुरुष ने हमेशा से ही महिलाओं को अपने अधीन रखना चाहा है. उसको एक संपत्ति मानकर  उसका स्वामी बनना चाह है. स्त्री को नियंत्रित कर उस पर स्वामित्व स्थापित करने का दृष्टिकोण  ही प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण कहलाता है। जब तक यह दृष्टिकोण बना रहेगा तब तक समाज में स्त्रियों से भेदभाव जारी रहेगा। वैश्विक चुनौतियों के इस युग में महिलाओं का पेशेवर होना, आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बराबरी का अवसर दिया जाना यह समय की मांग है। परंतु पितृसत्तात्मक समाज का प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण स्त्री को यह स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं है।

नैतिक बंधन– 

स्त्री के ऊपर अनेक प्रकार के नैतिक बंधनों की बेड़ियाँ डाल दी जाती है। जबकि पुरुष स्त्री के अपेक्षा ज्यादा स्वतंत्र होते हैं। उदाहरण के लिए मुस्लिम समाजों में बहु विवाह और तिहरा तलाक की प्रथा ही ले लें। स्त्री के लिए पर्दा प्रथा अनिवार्य है। स्त्री को पूरा शरीर ढक कर रखना होगा चाहे गर्मी कितनी भी क्यों न हो। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जिसके द्वारा स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि स्त्री के ऊपर अत्यधिक नैतिक बाध्यताएं आरोपित हैं। जबकि पुरुष को अत्यधिक स्वतंत्रता प्राप्त है।

भेदभाव के कारण महिलाओं को होने वाली परेशानियां

आज विश्व में नारीवाद और उसके संरक्षण के आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में तीव्र प्रसार हो रहा है। बावजूद इसके स्त्रियों के भाग्य का निर्णय अभी भी उसके पति और परिवार के हांथों में है।वे अपने व्यवहार, विवाह, परिवार, यौन सम्बन्ध तथा अन्य बातों के सम्बन्ध में स्वतंत्र नहीं है। स्त्री अपने कार्य को कितनी भी दक्षता से क्यों न करे पुरुष उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाँथ से चूकता नहीं है। इन भेदभाव और शोषण वादी मानसिकता के कारण महिलाओं को क्रूरता, हिंसा, यौन अत्याचार, शारीरिक और मानसिक शोषण, स्वस्थ्य जनित समस्याएं, आर्थिक विपन्नता, आत्मसम्मान को ठेस, आदि परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दुनिया के हर कोने में स्त्री के प्रति हिंसा की जा रही है चाहे वह विकासशील देश हों या विकसित, या फिर तथाकथित सभ्य और संपन्न राष्ट्र हों। स्त्री के प्रति अत्याचार और भेदभाव में सब भागीदार हैं। स्त्री  को शिक्षा का सामान अवसर न दिए जाने के पीछे समाज का षड़यंत्र है की उन्हें अशिक्षित रखो तभी वह गुलाम रहेगी।

स्त्री की समस्याओं को लेकर विश्व की चिंता –

हमारा विश्व ज्यों-ज्यों आगे की तरफ बढ़ रहा है वह अपने प्राचीन रिवाजों से उबरता जा रहा है। रफ़्तार भले ही कम हो परंतु सुधारवादी प्रयास जारी है। इसी कारण से जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र के जन्म के बाद मानवाधिकारों की उद्घोषणा 1948 में आया। तब से लेकर अब तक UN लगातार मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयास में प्रगति कर रहा है। इसी प्रयास के अन्तर्गत स्त्री के समस्याओं पर हमारे विश्व के स्थापित सरकारों ने गंभीरता दिखाई तथा स्त्री के मानवाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कदम भी उठाये गए। 25 नवम्बर को ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मिटाओ’ का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1999 में मान्यता दी ताकि लोगों में स्त्री अधिकारों को लेकर जागरूकता पैदा किया जा सके। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र द्वारा CEDAW पारित किया गया ताकि स्त्री के प्रति सभी तरह के भेद भाव का उन्मूलन किया जा सके।

महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय

समय समय पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों की रक्षा एवं विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न नियमों एवं अभिसमयो को पारित किया गया है। इनमे से कुछ निम्न है..

  1. Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW).
  2. Optional Protocol to the Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women.
  3. Universal Declaration of Human Rights
  4. International Convention on Civil and Political Rights
  5. International Convention on Social, Economic, and Cultural Rights
  6. Committee against Torture
  7. Conventions against Torture

Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW)-

संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18 दिसम्बर, 1979 को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। इसके दसवीं वर्षगांठ तक 100 देशों ने इसे स्वीकार कर लिया था। 1946 में संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा एक अंग का गठन किया गया था जिसका कार्य महिलाओं के अधिकार को बढावा देना और उनकी स्थिति पर नजर रखना था। 30 वर्षों के अथक परिश्रम के फलस्वरुप इस अंग का यह महान कार्य एक अभिसमय के रूप में जन्म ले सका। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है। इस अभिसमय का मुख्य लक्ष्य स्त्री और पुरुष के बिच समानता के अधिकार, मनुष्य की गरिमा, उसके मूल्य, एवं मनुष्य के मौलिक अधिकार में विश्वास को पुनः बहाल करना है।

“CEDAW” के प्रमुख प्रावधान- 

इस अभिसमय की संरचना 6 भागों में है तथा इसमें कुल 30 अनुच्छेद हैं।

Part I (Art-1 to 6)- यह भाग भेदभाव के निराकरण, सेक्स रुढीता और सेक्स के अवैध व्यापर पर केन्द्रित है।

Part II (Art 7to 9)- यह भाग महिलाओं के लिए राजनैतिक, सार्वजानिक क्षेत्र, प्रतिनिधित्व, और राष्ट्रीयता के मामले में अधिकारों की रुपरेखा प्रस्तुत करती है।

Part III (Art 10 to 14)- यह भाग स्त्री के सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों जैसे की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थय आदि पर केंद्रित है। यह भाग ग्रामीण महिलाओं के संरक्षण पर विशेष ध्यान देती है।

Part IV (Art 15 & 16)- विवाह एवं पारिवारिक जीवन में कानून की नजरों में समानता के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है।

Part V (Art 17 to 22)- राज्य पक्षकारों के रिपोर्टिंग की प्रक्रिया के सम्बन्ध में नियम के साथ-साथ एक समिति का भी गठन किया गया है जो महिलाओं के प्रति भेदभाव के उन्मूलन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उठाएगी।

Part VI (Art 23 to 30)- इस भाग में अभिसमय का अन्य संधियों पर क्या प्रभाव होगा तथा इसका राज्य पक्षकार और उसके प्रशासन पर क्या प्रभाव होगा इसके बारे में उल्लेख किया गया है।

“CEDAW” के तहत महिला अधिकार से संबंधित प्रावधान

CEDAW के Part I से लेकर Part IV ( Art. 1 से Art.16 तक ) महिला अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान दिए कए है जोकि निम्न प्रकार से है।

Art 1 – स्त्री के प्रति भेदभाव को परिभाषित किया गया है।

Art 2- इस अनुच्छेद के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है की अनुमोदन करने वाले पक्षकार यह सुनिश्चित करेंगे की उनके घरेलु कानून में लैंगिक समानता स्थापित हो तथा उनके कानूनों में से भेदभावपूर्ण प्रावधान निरस्त हो। महिलाओं के लिए ट्रिब्यूनल की स्थापना किया जाये। उनके खिलाफ भेदभाव मिटाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु समुचित कदम उठाया जाय।

Art 3- राजनैतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के स्त्री-पुरुष में समानता के आधार पर मानवाधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 4- मातृत्व के लिए विशेष सुरक्षा भेदभाव के अंतर्गत प्रगणित नहीं होगा।

Art 5- बच्चों की  परवरिश में स्त्री एवं पुरुष की समान जिम्मेदारी को निर्धारित अथवा मान्यता दिया जाय।

Art 6- राज्य पक्षकार महिलाओं की तस्करी, वेश्यावृति, और शोषण के सभी रूपों के उन्मूलन के लिए समुचित उपाय करें।

Art 7- राजनैतिक और सामाजिक जीवन में मतदान तथा सरकार में भागीदारी हेतु समानता के अधिकार की गारन्टी सुनिश्चित किया जाय साथ ही गैर सरकारी संगठनों एवं संघों में भी उनके समानता के अधिकार को गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 8- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सरकार का प्रतिनिधित्व करने और अंतराष्ट्रीय संगठनों में काम करने हेतु अवसर उपलब्ध कराने की गारन्टी प्रदान करना।

Art 9- राज्य पक्षकार महिलाओ को अपने और अपने बच्चों की राष्ट्रीयता को प्राप्त करने, बदलने, और बनाये रखने में पुरुष के बराबर अधिकार प्रदान करने हेतु बाध्य होंगे।

Art 10- महिला छात्रों को भी शिक्षा का समान अवसर प्राप्त होगा तथा सहशिक्षा को बढ़ावा दिया जायेगा। खेल, छात्रवृति, और अनुदान में स्त्री को बढ़ावा दिया जायेगा।

Art 11- इस अनुच्छेद के अंतर्गत स्त्री को समान कार्य के लिए समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, अवकाश और मातृत्व अवकाश का अधिकार प्रदान किया गया है। मातृत्व, गर्भावस्था या विवाह की स्थिति में बर्खास्तगी को निषिद्ध किया गया है।

Art 12- राज्य पक्षकार का यह दायित्व है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं से सम्बंधित सभी तरह के भेदभाव का उन्मूलन किया जाय। महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ परिवार नियोजन से सम्बंधित उचित कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार को सौपा गया है।

Art 13- स्त्री के आर्थिक व सामाजिक जीवन विशेषकर पारिवारिक लाभ, बैंक, ऋण, बंधक, वितीय ऋण, खेल, मनोरंजन गतिविधियों सहित सभी क्षेत्र में समानता के अधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 14- यह अनुच्छेद ग्रामीण महिलाओं और उनके समस्याओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। विकास कार्यक्रमों में भाग लेने, सभी सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा लेने, स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा का उपयोग, कृषि ऋण का उपयोग आदि सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार पर होने का प्रावधान इस अनुच्छेद के अन्तर्गत किया गया है।

Art 15- विधि के समक्ष पुरुष के बराबर समानता का अधिकार, संचरण एवं निवास का अधिकार प्रदान किया जायेगा।

Art 16- विवाह और परिवार से सम्बंधित सभी मामलों में भेदभाव का उन्मूलन, पति चुनने का अधिकार, परिवार का नाम चुनने का अधिकार, बच्चों की संख्या तय करने का अधिकार, आदि प्रदान किया गया है।

आलोचनात्मक समीक्षा

इस अभिसमय की आलोचना भी किया जा सकता है जैसे यह अभिसमय एक दन्त विहीन अभिसमय है जिसके पास अनुशास्ति की शक्ति नहीं है और न ही विभिन्न राज्यों के बीच कोई सामंजस्य स्थापित करने की बात करता है।

सबसे बड़ी कमी इस अभिसमय की यह है कि यह अभिसमय महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के समस्या के समाधान संबंधित नियम को तो उल्लेखित करता है। लेकिन इस अभिसमय के सदस्य के रुप मे किसी महिला सदस्य की बात नहीं करता है।

इस अभिसमय के अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि इस समिति के सदस्य उच्च नैतिक हैसियत एवं क्षमता वाले होंगे। इसमें उच्च नैतिक हैसियत को परिभाषित नहीं किया गया है।

Civil और Political Convention के प्रावधान से इस अभिसमय की एक खामी और है यह अभिसमय मानवाधिकार समिति से भी कमजोर समिति का निर्माण करता है क्यूंकि इसमें राज्यों के मध्य संवाद स्थापित करने की बात नहीं कही गई है।

इस अभिसमय की एक और तरीके से भी आलोचना की जा सकती है।—

विश्व में बहुत से ऐसे देश है जहाँ महिलाओं को कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है अगर कुछ अधिकार दिए भिगाए है तो वह अत्यंत सिमित है। यह अभिसमय ऐसे राज्यों के लिए कोई भी बाध्यकारी उपबन्ध नहीं कर पाया है।

यह अभिसमय महिलाओं के लिए समान दर्जा की बात तो करता है परन्तु विश्व के बहुत से ऐसे राष्ट्र है जहाँ की महिलाओं को यह पता ही नहीं है कि उन्हें सम्पति या अन्य सामुदायिक मसले में क़ानूनी रूप अधिकार मिला है। यह अभिसमय ऐसी महिलाओं के लिए कोई सुझाव नहीं देता है।

मूल्यांकन

जैसा की  हम जानते है संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18  दिसम्बर, 1979  को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। समय के साथ साथ इसके सदस्य देशों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती गई और इसका विस्तार कई देशों में हो गया। महिलाओं की उन्नति के लिए इस अभिसमय में कई प्रावधान है जिससे उनको समाज मे बराबरी का दर्जा प्राप्त हो सके एवं उनके साथ हो रहे भेदभाव को कम किया जा सके।

परन्तु वास्तविकता यह है कि आज के वैश्विक समाज में कोई भी किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून को बिना प्रयाप्त बाध्यकारी उपबन्ध के सामान रूप से लागु कर पाना बहुत ही मुश्किल है। “CEDAW” की स्थिति भी ऐसी ही है.यह अभिसमय भी कई प्रकार की कमियों से युक्त है जो इसके पूर्ण रूप से लागु होने में बाधक है। इसप्रकार यह अभिसमय आजके समय में उतना प्रभावी नहीं है जितना इसके गठन करते समय अपेक्षा की गई थी।

लेकिन इन सबके बावजूद भी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है।

 

 

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजाना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana in hindi )

Pradhan Mantra ujjwala-yojana

भारत सरकार ने एक  महत्पूर्ण योजना  “प्रधानमंत्री  उज्ज्वला योजाना” की शुरुआत 1 मई ,2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया  जिले  के माल्देपुर से हुई । यह उज्जवला योजना ग्रामीण इलाके में ,गरीबी रेखा के निचे गुजर -बसर करने वाले गरीब परिवारों के लिए रियाती मूल्य पर एलपीजी कनेक्शन तथा उसकी आपूर्ति करने के उद्देश्य से की गयी हैं।

Pradhan Mantra ujjwala-yojana
Pradhan Mantra ujjwala-yojana

आज 21 वी शताब्दी  में  भी ग्रामीण  इलाको में लकड़ी या  गोबर के उपलो (गोइंठा )  पर  खाना  बनाने  से बहुत ज़्यादा मात्रा  धुंआ  निकलता  है।  धुंए के  माध्यम  से निकलने वाली   हानिकारक  गैसे, अनेक प्रकार के नुकसान  पंहुचाती  हैं। जो  महिला खाना बनाती है उसके सांस लेने के माध्यम से उसके फेफड़ो तथा अन्य अंगो को नुकसान  पंहुचाती  हैं। जिससे कई अन्य बीमारियाँ होने की भी सम्भावना बनी रहती है।  यह  वातावरण  को दूषित करके,हमारे  वातावरण  की रक्षा करने वाली ओजोन  पर्त  को नुकसान पंहुचाती  हैं। इस प्रकार यह उज्ज्वला योजाना महिलाओ के स्वास्थ्य  सुधार तथा वातावरण सुधार कि दृष्टि  से भी महत्वपूर्ण  है।

इस योजाना की पंच लाइन  है स्वच्छ  ईधन, बेहतर जीवन “।   इस  सामाजिक कल्याण योजना उद्देश्य  के  अन्तर्गत, वर्ष 2019  तक 5 करोड़ कनेक्शन  गरीबी रेखा  से  नीचे जीवन यापन करने वाले  गरीब परिवार को धुंआ रहित जीवन देने की है।  इस परियोजना पर भारत सरकार लगभग 8 हजार करोड़ खर्च  करेगी।

इस योजना के सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां इस प्रकार हैं.

 योजना का उद्देश्य

  1. उज्जवला योजना के अनुसार एलपीजी कनेक्शन परिवार की महिला सदस्य के नाम से दिया जायेगा, जो महिला सशक्तिकरण को मजबूती प्रदान करता है ।
  2. ग्रामीण महिलाओं को एलपीजी कनेक्शन देकर उनको धुंये और हानिकारक गैसों से मुक्ति देना ।
  3. तथा धुँए और हानिकारक गैसों से होने वाली जानलेवा बीमारियों से रोकना ।

 योजना का बजट एवम आवंटित धनराशि

  1. भारत सरकार ने वित्तीय वर्ष 2016 -2017 में शुरू होने वाली इस योजना के लिए आगामी तीन वर्ष 2016-17 , 2017 -18 , 2018-19 के लिए 8 हज़ार करोड़ रुपये के वजट का आवंटन किया है। वित्तीय वर्ष 2016-2017 के लिए  कुल 2  हज़ार करोड़ रूपये का आवंटन किया गया हैं। तथा इस साल डेढ़ करोड़ बीपीएल कार्ड धारक परिवारों को गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य  रखा है।
  2. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अपील पर लगभग 1 करोड़ 13 लाख परिवारों में गैस सब्सिडी छोड़ दी जिससे भारत सरकार को लगभग 5 हज़ार करोड़ रूपये का की बचत हुयी है जिसका उपयोग इस  उज्जवला योजना  में किया जायेगा ।
  3. इस उज्जवला योजना के द्वारा प्रत्येक एलपीजी कनेक्शन के लिए भारत सरकार 1600 रूपये कि वित्तीय मदद भी करेगी । सरकार के द्वारा गैस रिफिलिंग के लिए मासिक किस्तो पैट लोन की सुविधा भी दे रही है।

 इस योजना में कौन -2 एलपीजी कनेक्शन ले सकता है और उसकी पात्रता क्या होगी

  1. आवेदन करने वाली महिला की उम्र 18 वर्ष से ज्यादा होनो चाहिए।
  2. आवेदन करने वाली महिला बीपीएल कार्ड धारक तथा ग्रामीण निवासी होनी चाहिए।
  3. गैस सब्सिडी लेने के लिए महिला का किसी सरकारी बैंक में बचत खता होना चाहिए।
  4. आवेदन करने वाले परिवार में पहले से कोई गैस कनेक्शन नहीं होना चाहिए।

 कौन -2 से जरुरी कागजात लगेंगे

  1. बीपीएल राशन कार्ड ( सफ़ेद ता लाल राशन कार्ड ) की छाया प्रतिलिपि।
  2. ग्राम प्रधान या नगर पालिका अध्यक्ष के द्वारा जारी बीपीएल प्रमाण पत्र।
  3. एक फोटो पहचान पत्र जिससे की आवेदक की पहचान हो सके जिसमे आधार कार्ड का वोटर कार्ड शामिल है।
  4. पासपोर्ट साइज का फोटो जो हाल -फिलहाल में बनवाया गया हो जिससे उसकी पहचान हो सके।
  5. जनधन योजना के अंतर्गत खोला गया खाता या कोई अन्य बचत खाता तथा आधार कार्ड नंबर की जरुरत होगी।

रबीन्द्रनाथ टैगोर, एक जीवन परिचय(Biography of Rabindranath Tagore in Hindi)

जब कभी भी भारतीय साहित्य के इतिहास की चर्चा होगी तो वह गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर  के नाम के बिना अधूरी ही रहेगी। रबीन्द्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार तथा चित्रकार थे। भारतीय साहित्य गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के योगदान के लिए सदैव उनका ऋणी रहेगा। वे अकेले ऐसे भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम एशियाई और साहित्य में नोबेल पाने वाले पहले गैर यूरोपीय भी थे।

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वह दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान हैं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला’ रबीन्द्रनाथ टैगोर की ही रचनाएँ हैं। गुरुदेव एवं कविगुरु, रबीन्द्रनाथ टैगोर के उपनाम थे। इन्हें रबीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम से भी जाना जाता है।

रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 May 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में एक अमीर बंगाली परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। उनकी प्रारम्भिक पढ़ाई सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई। वे वकील बनने की इच्छा से 1878 ई. में लंदन गए, लेकिन वहाँ से पढ़ाई पूरी किए बिना हीं 1880 ई. में वापस लौट आए।

टैगोर बचपन से हीं बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। रबीन्द्रनाथ टैगोर की बाल्यकाल से कविताएं और कहानियाँ लिखने में रुचि थी।  उन्होंने अपनी पहली कविता 8 साल की छोटी आयु में हीं लिख डाली थी 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी। टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की है। रबीन्द्रनाथ  संगीत, बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है।

लन्दन से वापस आने के पश्चात वर्ष 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी से हुआ। इंग्लैंड से वापस आने और अपनी शादी के बाद से लेकर सन 1901 तक का अधिकांश समय रबीन्द्रनाथ ने सिआल्दा जो अब बांग्लादेश में  है, स्थित अपने परिवार की जागीर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बिताया। यहाँ उन्होंने ने ग्रामीण एवं गरीब जीवन को बहुत पास से देखा। इस बीच तक उन्होंने ग्रामीण बंगाल के पृष्ठभूमि पर आधारित कई लघु कथाएँ लिखीं एवं स्वयं को एक विख्यात साहित्यकार के रूप में स्थापित कर लिया था।

 

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रबीन्द्रनाथ टैगोर बचपन से ही प्रकृति प्रेमी थे। वह हमेशा सोचा करते थे कि प्रकृति के सानिध्य में ही विद्यार्थियों को अध्ययन करना चाहिए। इसी सोच को मूर्तरूप देने के लिए वह 1901 में वह शान्तिनिकेतन आ गए। प्रकृति के सान्निध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शान्तिनिकेतन की स्थापना की। यह रबीन्द्रनाथ के अथक प्रयासों का ही नतीजा था कि उनके द्वारा स्थापित शान्तिनिकेतन 1921 ई. में विश्वभारती नामक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में ख्यातिप्राप्त हुआ। यह साहित्य, संगीत और कला की शिक्षा के क्षेत्र में पूरे देश में एक आदर्श विश्वविद्यालय के रूप में पहचाना जाता है।  देश के कई प्रमुख व्यक्तियों ने यहाँ से अपनी शिक्षा प्राप्त किया है।

http://www.utsavmantra.in/wp-content/uploads/2016/09/Rabindranath_Tagore.jpg  साहित्य की शायद ही ऐसी कोई विधा हो, जिनमें उनकी रचना न हो कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला सभी विधाओं में उन्होंने रचना की है। उनकी कृतियों में – गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष,, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका,  खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब और पोस्टमास्टर उनकी कुछ प्रमुख प्रसिद्ध कहानियाँ है। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की सबसे लोकप्रिय रचना ‘गीतांजलि’ रही जिसके लिए 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। गीतांजलि लोगों को बहुत पसंद आई. गीतांजली का अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया।  टैगोर का नाम दुनिया के कोने-कोने में फ़ैल गया और वे विश्व – मंच पर स्थापित हो गये। रबीन्द्रनाथ टैगोर के कार्यो को देखकर अंग्रेज सरकार ने 1915 ई. में उन्हें सर की उपाधि से समानित किया।

अपने जीवन में उन्होंने कई देशों की यात्रा किया. आइंस्टाइन जैसे महान वैज्ञानिक, रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘‘रब्बी टैगोर’’ के नाम से पुकारते थे। आइंस्टाइन , रबीन्द्रनाथ के प्रसंशक थे। यहूदी धर्म एवं हिब्रू भाषा में ‘‘रब्बी’’ का अर्थ “गुरू’’ अथवा “मेरे गुरु” होता है। 1919 में हुए जलियाँवालाबाग हत्याकांड की टैगोर ने जमकर निंदा की और इसके विरोध में उन्होंने अपना “सर” का ख़िताब लौटा दिया।

  रबीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु लम्बी बीमारी के कारण 7 अगस्त 1941 को कोलकाता में हुई। रबीन्द्रनाथ टैगोर भारत के उन महान विभुतिओं में से एक है जिनका नाम सदैव सुनहरे अक्षरों में हमारे मन मस्तिष्क पर अंकित रहेगा। वे भारत के अनमोल रत्नों में से एक थे। प्रस्तुत लेखन के द्वारा मैंने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के जीवन वृतांत को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह मेरी तरफ से कविगुरु को श्रधांजलि है। आप जैसे महापुरुष को शत्- शत् नमन है।

Biography of Rabindranath Tagore in Hindi

प्रेमचंद, एक जीवन परिचय(biography of premchand in hindi)

प्रेमचंद महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। इन्हे हिन्दी साहित्य का कथानायक और उपन्यास सम्राट भी कहा जाता है। प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को  वाराणसी  केनिकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था। उनके पिता  लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद  का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी सेहुआ।  अपने पढ़ने के शौक़ के चलते साहित्य मे उनकी रुचि बचपन से ही हो गई। बचपन में ही उन्होने ने देशी विदेशी कई साहित्य की किताबें पढ़ डाली।

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सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। उस समय के प्रथा के अनुसार उनकी शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में ही हो गया जो की सफल नहीं रहा। बाद में उन्होने दूसरा विवाह शिवरानी देवी से किया जो की बाल विधवा थी।

पिता की असमय देहांत के कारण घर परिवार की ज़िम्मेदारी भी बहुत ही कम उम्र मे उनके ऊपर आ गई। अपने पिता के देहांत के बाद भी उन्होने अपनी शिक्षा जारी रखा एवं मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद जीवनयापन के लिए एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी कर लिया। अध्यापन का कार्य करते हुए ही उन्होने ब० ए० पास किया एवं शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए। बाद में गांधीजी से प्रेरित होकर उन्होने नौकरी से इस्तीफा  दे दिया और स्वयं को देशसेवा एवं लेखन कार्य में पूरी तरह समर्पित कर दिया।

आधुनिक हिन्दी साहित्य पर प्रेमचंद का बड़ा ही व्यापक प्रभाव है। उनका साहित्यिक जीवन 1901 से ही शुरू हो गया था। पहले पहल वे नाबाब राय के नाम से लिखते थे। 1908 मे प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन अर्थात राष्ट्र का विलाप  नाम से प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी सरकार ने रोक लगा दी और इसके लेखक को भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर जला दी गईं। इस घटना के बाद प्रेमचंद के मित्र एवं ज़माना पत्रिका के संपादक  मुंशी दयानारायण निगम  ने उन्हे प्रेमचंद के नाम से लिखने की सलाह दिया। इसके बाद धनपत राय, प्रेमचंद  के नाम से लिखने लगे। प्रेमचंद के नाम से उनकी पहली कहानी ज़माना पत्रिका के दिसम्बर 1910 मे प्रकाशित हुई। इस कहानी का नाम बड़े घर की बेटी  था। अपने लेखन काल मे प्रेमचंद ने सैकड़ो कहानियां लिखी। उन्होने ने हिन्दी लेखन में यथार्थवाद की शुरुआत की। उनके रचनाओ में  हमे कई रंग देखने को मिलते है। मुख्य रूप से प्रेमचंद ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो का सजीव वर्णन अपने साहित्यिक रचना के माध्यम से किया है। उनकी रचनाओ में हमे तत्कालीन दलित समाज, स्त्री दशा एवं समाज में व्याप्त विसंगतियाँ का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से होता है।

महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होने 1921 में अपनी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद कुछ दिनों तक उन्होने ने मर्यादा नामक पत्रिका में सम्पादन का कार्य किया।उसके बाद छह साल तक माधुरी नामक पत्रिका में संपादन का काम किया। 1930 से 1932 के बीच उन्होने अपना खुद का मासिक पत्रिका हंस  एवं साप्ताहिक पत्रिका जागरण  निकलना शुरू किया। कुछ दिनों तक उन्होने ने मुंबई मे फिल्म के लिए कथा भी लिखी। उनकी कहानी पर बनी फिल्म का नाम मज़दूर था, यह 1934 में प्रदर्शित हुई। परंतु फिल्मी दुनिया उन्हे रास नहीं आयी और वह अपने कांट्रैक्ट को पूरा किए बिना ही बनारस वापस लौट आए। प्रेमचंद ने मूल रूप से हिन्दी मे 1915 से कहानियां लिखना शुरू किया। उनकी पहली हिन्दी कहानी 1925 में  सरस्वती पत्रिका  में सौत  नाम से प्रकाशित हुई। 1918 ई से उन्होने उपन्यास लिखना शुरू किया। उनके पहले उपन्यास का नाम सेवासदन  है। प्रेमचंद ने लगभग बारह उपन्यास तीन सौ के करीब कहानियाँ कई लेख एवं नाटक लिखे है।

प्रेमचंद द्वारा रचित कहानियों में  पूस की रात, ईदगाह,बड़े भाई साहब, अलगोझा,गुल्ली डंडा, पंच परमेश्‍वरदो बैलों की कथा, बूढी काकी, मंत्र, कफन इत्यादि प्रमुख कहानियाँ है।

प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यासों में सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान इत्यादि प्रमुख है। उनक अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र  है जो अपूर्ण है इसी उपन्यास के रचना के दौरान 8 October 1936 को लंबी बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने यह उपन्यास पूरा किया।

प्रेमचंद ने संग्राम‘ ‘कर्बलाऔर प्रेम की वेदी‘ नामक नाटकों की रचना किया है। मरने के बाद प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर  नाम से आठ भागो मे प्रकाशित हुई है। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का योगदान अतुलनीय है। बंगाल के प्रमुख उपन्यासकार शरत चंद्रचट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर नए उपनाम से संबोधित किया था। उनके बेटे अमृत राय ने कलम का सिपाही  नाम से उनकी जीवनी लिखी है जो उनके जीवन पर विस्तृत प्रकाश डालती है।

कौन कहता है कि कोई अमर नहीं हो सकता, जबतक यह दुनिया है प्रेमचंद अपने रचना के माध्यम सदैव सभी के दिलों से अमर रहेंगे।  प्रस्तुत लेख में मैंने कथानायक प्रेमचंद के जीवन (biography of premchand in hindi)  को संक्षिप्त रूप से वर्णन करने का प्रयास किया है।

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