कहानियाँ Archive

“सुखी” सुख बाँटता है

एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था। एक कार अचानक ही पार्किंग से निकलकर रोड पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते टकराते बची।   ...Read More

आत्म-संगीत- प्रेमचंद(Atam-Sangeet Story by Premchand)

आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी घ्वनियॉँ इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकाश छा रही थी, जैसे हृदय पर ...Read More

अपरिचिता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर (Aparichita by Ravindranath Thakur)

अपरिचिता              आज मेरी आयु केवल सत्ताईस साल की है। यह जीवन न दीर्घता के हिसाब से बड़ा है, न गुण के हिसाब से। तो भी इसका एक विशेष मूल्य है। यह उस फूल के समान है जिसके वक्ष ...Read More

आल्हा- प्रेमचंद(Alha Hindi Story By Premchand)

आल्हा- प्रेमचंद(Alha Hindi Story By Premchand) १. आल्हा का नाम किसने नहीं सुना। पुराने जमाने के चन्देल राजपूतों में वीरता और जान पर खेलकर स्वामी की सेवा करने के लिए किसी राजा महाराजा को भी यह अमर कीर्ति नहीं मिली। राजपूतों के नैतिक नियमों ...Read More

खुशी हमारे मन में होती है…

जंगल में एक कौआ रहता था जो अपने जीवन से पूर्णतया संतुष्ट था।लेकिन एक दिन उसने बत्तख देखी और सोचा, “यह बत्तख कितनी सफ़ेद है और मैं कितना काला हूँ। यह बत्तख तो संसार की सबसे ज़्यादा खुश पक्षी होगी।” उसने अपने विचार बत्तख ...Read More

पैसे की थैली किसकी (Akbar-Birbal)

  दरबार लगा हुआ था। बादशाह अकबर राज-काज देख रहे थे। तभी दरबान ने सूचना दी कि दो व्यक्ति अपने झगड़े का निपटारा करवाने के लिए आना चाहते हैं। बादशाह ने दोनों को बुलवा लिया। दोनों दरबार में आ गए और बादशाह के सामने ...Read More

मैं आपका नौकर हूं, बैंगन का नहीं (Akbar-Birbal)

एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। फले-फूले बाग को देखकर बादशाह अकबर बहुत खुश थे। वे बीरबल से बोले, ‘बीरबल, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं!’ इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है! बीरबल, मुझे ...Read More

विद्वत्ता का घमंड

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था I शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था Ι अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया Ι उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है ...Read More

विलासी (Vilasi by Sharat Chandra)

पक्का दो कोस रास्ता पैदल चलकर स्कूल में पढ़ने जाया करता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ, दस-बारह जने हैं। जिनके घर देहात में हैं, उनके लड़कों को अस्सी प्रतिशत इसी प्रकार विद्या-लाभ करना पड़ता है। अत: लाभ के अंकों में अन्त तक बिल्कुल शून्य ...Read More

अनुपमा का प्रेम (Anupama ka prem by Sharat Chandra)

ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर ...Read More

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