मनुष्य और अध्यात्म-Human and Spirituality

मनुष्य और अध्यात्म-Human and Spirituality

मनुष्य  की चेतना एक कैद में, एक स्वप्न जाल में उलझी हुयी है । उसे संदेह तो  होता है परन्तु मन के द्वारा बुने गए माया जाल में उलझकर भविष्य की आशा और उम्मीदों में इसे नजर अंदाज कर देता है । हम सभी के जीवन में वो क्षण कभी न कभी आता है की वह स्वयं से पूछ बैठता है की आखिर हम जी क्यों रहे है? हमे क्या चाहिए? हमारी मंजिल कहा है? हम कहा से आये हैं ? एक दिन कहाँ खो जायेंगे ?

ये ऐसे प्रश्न हैं जो सभ्यता के आदि से मनुष्य के अंतर्मन में उठता रहा है की सत्य  क्या है ? जीवन या मृत्यु ! शाश्वत क्या है ? अँधेरा या प्रकाश ! मनुष्य सुख ढूंढता है परन्तु अंततः दुःख ही क्यों प्राप्त करता है ? क्या नित्य है ? सुख या दुःख !

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वास्तव में ऐसे प्रश्न एक विचारशील, मननशील मनुष्य के अंतर्मन में उठता ही रहा है । परन्तु आरम्भ से ही भूल इन प्रश्नों में ही छिपा है। क्योंकि ये प्रश्न ही गलत है । सत्य क्या है ? लोग सोचते हैं की या तो जीवन सत्य होगा या फिर मृत्यु ! दोनों एक साथ सत्य कैसे हो सकते है ? या तो हम अविनाशी है या मरणशील । भौतिकवादी कहते है की यही जीवन सबकुछ है इस जीवन के आलावा कोई जीवन नहीं। अध्यात्मवादी या धार्मिक लोग विश्वास करते है की मृत्यु एक भ्रम है जब हम मरते है तो भी मर नहीं जाती किसी और रूप में हमारा अस्तित्व होता है।

मेरा कहना है की ये दोनों ही गलत है। सवाल केवल एक के सत्य होने का नहीं है दोनों ही एक साथ सत्य है। सत्य इतना विराट  है की वो सभी प्रकार के विरोधाभास को अपने अन्दर समाहित कर लेता है।  सवाल किसी एक के सत्य होने का जिद पाल लेने की नहीं है। सवाल है अंतर्दृष्टि जागृत करने का, मूल प्रश्न स्वयं से यह पूछना चाहिए की क्या हमारे पास वो अंतर्दृष्टि है जिससे हम समग्र का दर्शन कर सके। जब हम अन्तरदृष्टि पाने के प्रश्न पर सहमत होते है तब वहीँ से वास्तव में अध्यात्मिक यात्रा की राह प्रारम्भ होती हैं।

जब हम अपने अन्दर होश का वो दिया जलाने को तत्पर होते है जिससे सत्य का, समग्र का दर्शन संभव हो सके तब हम दर्शनशास्त्र के वाद विवाद या किसी सिद्धांत अथवा मत के खंडन मंडन के पचरे में न परकर हम उस विधि की तलाश में निकलतें हैं जिससे सत्य तक पहुंच पाना सभव हो सके ।

एक बार जब हम अपने होश या ध्यान को साधने के लिए वादविवाद के व्यह्मोह से हटकर विधि में रूचि रखने लगते है तब समझते है कि जीवन में वास्तविक शिष्यत्व का जन्म हुआ है। अब गुरु शिष्य को विधि देने को तैयार होता है और शिष्य उसे ग्रहण करने को।  इससे पहले की सारी बाते तैयारीयां भर होती हैं….. केवल भूमिका भर होती है।

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अगर विधि की बात करें तो विधि तो हजारों है जिनसे से होश को साधा जा सकता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की जितने मनुष्य है उतनी विधियां हो सकती हैं। क्यों की हर मनुष्य अपने आप में अलग और अद्वितीय है। किसी दुसरे की विदि किसी और के काम आ जाये यह हमेसा संभव नहीं। इसलिए अध्यात्मिक यात्री को हमेसा एक मार्गदर्शक, एक ऐसे सहयात्री की जरुरत होती है जो जानता है, जो पहुंचा है, जिसने सत्य को देखा है, जिया है।  परन्तु अध्यात्मिक पथ के यात्री को इसकी चिंता करने की जरुरत नहीं जब तुम तैयार होते हो तो गुरु आ ही जाते हैं।

कई प्रचलित विधि जैसे- विपश्ना, ध्यान योग, तंत्र, आदि की चर्चा हम आगे करेंगे साथ ही इन मार्गो पे चलने के फायदे और बरतने वाली सावधानियों पर भी चर्चा करेंगे।

 

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