सही-ग़लत(Sahi Galat Hindi Poem)

सही-ग़लत(Sahi Galat Hindi Poem)

 

रात के अँधेरे में अगर तुम,

चेहरा ढक कर निकलोगे तो

तुम्हे लोग पहचान लेंगे,

तुम्हारी नियत जान लेंगे ।।

तुम सही नहीं हो

तुम जरुर सही नहीं हो

तुम ग़लत हो या

ग़लत करने जा रहे हो  ।।

तूने ऐसा क्या किया, कि

 अपना चेरा ढक लिया ?

चोरी की या डकैती की

खून किया या किसी की

इज्जत लूट ली  ?

आखिर कौन सा

ऐसा काम किया, कि

तूने अँधेरे में भी

 आपना चेहरा ढक लिया  ?

२.

तुम सही नहीं हो

तुम जरूर सही नहीं हो ।।

तुम गलत हो,

तुम ग़लत ही हो ।।

सही आदमी को कैसा डर,

क्यों छुपाये चेहरा या सर ।।

ये तो चलते है अपने पथ पर

होके निडर …

अँधेरा हो रात का..या हो दिन दोपहर  ।।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna)

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna) की शुरुआत अप्रैल 2015 में भारत सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण हेतु किया गया था। इस योजना का उद्देश्य  गरीबों के कल्याण के लिए, भारत सरकार द्वारा गरीबों के हित एवं कल्याण से सम्बंधित पूर्ववर्ती योजनाओं को सही प्रकार से लागु करना है। इसके लिए भारत सरकार ने एक कार्यशाला का भी आयोजन किया था जिससे लोगो को इस बारे में जागरूक किया जा सके।  इसी क्रम में नवम्बर 2016 में भारत सरकार द्वारा इनकम टैक्स में संसोधन किया गया है जिससे की गरीबों से सम्बंधित कल्याणकारी योजनाओ को सुचारू रूप से  प्रभावी करने हेतु अतरिक्त धन का प्रबंध किया जा सके।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ कौन उठा सकता है?

यह योजना गरीबों के कल्याण हेतु है। अत: कोई भी भारतीय नागरिक जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है इस योजना का लाभ उठा सकता है। इसके लिए अगर वह ग्रामीण क्षेत्र का है तो ग्राम-पंचायत तथा शहरी क्षेत्र का है तो नगरपलिका से संपर्क कर विस्तृत जानकारी ले सकता है।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना ( Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojna) का विस्तार

भारत सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली से 29 नवम्बर 2016 को इनकम टैक्स एक्ट में संशोधन के लिये एक विधेयक प्रस्तावित किया ।जिसके द्वारा 30 दिसम्बर 2016 तक जो व्यक्ति जिसके पास भी कालाधन या अवैधानिक तरीके से कमाई  गयी सम्पति है । जिस पे इनकम टेक्स नहीं दिया गया  है अगर अपने धन का स्वं खुलासा करता है तो उस धन पे 49.9 % (लगभग 50%) का टेक्स लगेगा । बाकि की 25% धनराशी  को 4 वर्षो के लिये प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में जमा करा दिया जायेगा । इसके साथ ही साथ उस धनराशी पर कोई ब्याज नहीं दिया जायेगा । आगामी 4 वर्षो तक यह धनराशी फ्रीज़ अवस्था में रहेगी| यहाँ फ्रीज़ अवस्था से तात्पर्य ये है की वह व्यक्ति उस धन का उपयोग नहीं कर पायेगा । 4 वर्षो के बाद वह धन राशी उस व्यक्ति की वापस दे दि जाएगी| बाकि की 25% धनराशी का उपयोग वह व्यक्ति  तत्काल कर सकता है।

एक उदहारण के माध्यम से हम इसे आसानी से समझ सकते है। मान लीजिये की किसी व्यक्तिके पास कालाधन के रूप में 100 रूपये है-

  1.  इस 100 रूपये पर 49.9 %( लगभग 50% का टेक्स लग  जायेगा i.e. 100 का 50% = 50 रूपये टैक्स में चला जायेगा
  2. उस 100  रूपये का 25% , प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में चला जायेगा (100 का25 % = 25 रूपये)
  3. और 100 रूपये का बाकि बचा हिस्सा 25 रूपये उस व्यक्ति को तुरंत वापस दे दिया जायेगा

साथ ही साथ प्रस्तावित संशोधनों में यह भी प्रावधान है कि अगर 30 दिसम्बर 2016 तक किसी व्यक्ति अपना काला धन घोषित नहीं किया है  और इनकम टैक्स विभाग को उस धन का पता लग जाता है तो  उस स्थिति में उस सम्पूर्णराशी का 85% टैक्स और जुर्माने के रूप में वसूला जायेगा।

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प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना उपयोगिता

किसी योजना को बनाने और लागु करने के लिये बहुत अधिक मात्रा में धन  की आवश्कता होती है। खास तौर पर गरीबो के लिये बनायीं गयी योजना में । इस योजना में एकत्रित धन का उपयोग सरकार भारत के गरीबो के लिये नयी योजनायें बनाने में करेगी जिससे देश की गरीब जनता के जीवन स्तर को उपर उठाने में मदद मिलेगी, साथ ही साथ उनके लिये भोजन , स्वच्छ पानी ,रहने के स्थान और स्वास्थ्य संबधित आवश्कता की पूर्ति की जा सकती है। ये भारत सरकार का एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है।

भेदभाव के विरुद्ध महिला अधिकार ( Discrimination against women’s rights)

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प्रस्तावना (Introduction)

आज भी हमारे समाज में महिलाओं से भेदभाव जारी है। सच्चाई यही है चाहे हम जितना भी विकसित और आधुनिक होने का दावा क्यों न कर लें परन्तु हमारा समाज आज भी महिलाओं के सशक्तिकरण से खौफ खाता है। दुनियां के प्रमुख निर्णायक जगहों पर महिलाओं की गिनती न के बराबर है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो टॉप की 500 कम्पनियाँ हैं उनमे सिर्फ 10% महिलाएं ही वरिष्ठ प्रबंधक है।

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दरअसल कम पुरुष ऐसे हैं जो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने को तैयार हैं। लोग बहुत होशियारी से महिलाओं के प्रति भेदभाव को किसी न किसी रूप में जारी रख रहे हैं। आम लोगों की तो बात छोड़ ही दे नारीवादी कार्यकर्ता, लेखक और विचारकों की निजी जिन्दगी भी उत्साहवर्धक उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते।

आज महिलाएं पुरुष के कंधे से कन्धा मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन लिंग आधारित भेदभाव अब भी मौजूद है। नौकरियों में महिलाओं का प्रमोशन रोक दिया जाता है क्योंकि अब उसकी शादी होने वाली है।  महिलाओं को कार्य स्थल पर सेक्सुअल पॉलिटिक्स का भी सामना करना पड़ता है। सबसे पावरफुल देश के सबसे पावरफुल पद के लिए चुनाव लड़ रही हिलेरी क्लिंटन को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियां के लगभग हर देश में महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।  ऐसा इसके बावजूद हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र के सभी 185 सदस्य देशों ने यह वादा किया था की 2005 तक वे उन सभी कानूनों को ख़त्म कर देंगे जो महिलाओं से भेदभाव करता है।

भेदभाव क्या है?

औचित्य या न्याय का विचार त्याग कर किसी एक पक्ष को वरीयता या सहानुभूति अथवा समर्थन देना भेदभाव कहलाता है। सरल शब्दों में हम इस प्रकार भेदभाव को परिभाषित करने का प्रयास कर सकते हैं कि- भेदभाव या विभेदन किसी व्यक्ति या अन्य चीज के पक्ष में या उस के विरुद्ध, गुणों-अवगुणों को न देखते हुए, इसके किसी वर्ग, श्रेणी या समूह का सदस्य होने के आधार पर, भेद करने की प्रक्रिया को कहते हैं।

भेदभाव में अक्सर किसी व्यक्ति को केवल उसके वर्ग के आधार पर अवसरों, स्थानों, अधिकारों, और अन्य चीजो से वंचित कर दिया जाता है। भेदभाव वाली परम्पराए और नीतियां, विचार कानून और रीतियाँ बहुत से समाजो, देशो, और संस्थाओ में है। धार्मिक रूप से कट्टर समाजों में यह ज्यादा देखने को मिलता है।

महिलाओ के साथ बरते जाने वाली भेदभाव के तरीके, प्रकार, तथा स्थान

  • वचन द्वारा

  • व्यव्हार द्वारा

  • अवसरों में कमी

  • धार्मिक क्रियाकलाप

  • समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि

  • भावनात्मक

  • मानसिक

  • आर्थिक निर्भरता

  • प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण

  • नैतिक बंधन

वचन द्वारा 

सबसे अधिक उपयोग में लाया जाने वाला तथा क्रूरतापूर्ण तरीका वचन है। जिसके माध्यम से हम सिर्फ क्रूरता ही नहीं करते बल्कि वक्त-बेवक्त महिलाओ को यह अहसास कराते हैं कि वो कितनी छुद्र और दुर्बल है। अपने बोलचाल की शैली तथा प्रयुक्त शब्दावली के माध्यम से आये दिन भेदभावमूलक बर्ताव करते है। हमारा समाज इतना असंवेदनशील है की उसे  इस गम्भीर तरीके पर गौर करना भी औचित्यपूर्ण नहीं लगता।  यहाँ तक की स्त्री स्वयं भी इसे दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार करती चली जाती है। यह इतना स्वीकार्य और सरल हो गया है की उन्हें इस बारे में कुछ भी अजीब नहीं लगता।  इस तरह की समस्या विकाशशील देशो एवं धर्म भीरु समाज जैसे की एशियाई, भारतीय और मुस्लिम समाजों में ज्यादातर देखने को मिलता है।

व्यवहार द्वारा

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से हमेशा स्त्री पुरुष में भेदभाव किया जाता है। हमने तय कर रखे हैं की स्त्री और पुरुष के पहनावे क्या होंगे ? उनके व्यहार कैसे होंगे ? आदि।

अवसर की कमी- 

स्त्री किसी भी तरह से योग्यता में पुरुष से कमतर नहीं है बल्कि कई जगहों पर तो उसने अपने को बढ़कर साबित किया है। स्त्री के प्रति भेदभाव का सबसे बड़ा तरीका जो समाज में देखने को मिलता है वह है उनके लिए अवसर की उपलब्धता में कमी, उनके लिए क्षेत्रों को सिमित किया जाना। उनके उम्र, शारीरिक एवम मानसिक क्षमता, आदि पर पुरुष को वरीयता दिया जाना।

धार्मिक क्रियाकलाप 

धार्मिक अनुष्ठान में पुरुष को प्राथमिकता दिया गया है। लगभग हर धर्म के धार्मिक कृत्यों में स्त्री को द्वितीय स्थान प्रदान किया गया है।  हिन्दू धर्म में स्त्री न तो मुखाग्नि दे सकती है, न ही श्राद्ध कर सकती है, और न ही  पुरुष के बिना कोई मुख्य यज्ञ संपन्न कर सकती है। ‘पुत्र के बिना नरक से मुक्ति संभव नहीं’ की अवधारणा है। ऐसा ही हाल कमोबेश सभी धर्मो का है। मुस्लिम समाज में स्त्री की स्थिति और भी दयनीय है।

समाजिक प्रथा एवं रूढ़ि 

समाज में महिलाओं को परंपरागत रूप से कमजोर जाति-वर्ग के रूप में माना जाता है। वह पुरुष के अधीन होती है।लवह घर और घर के बाहर दोनों जगह शोषित, अपमानित, आक्रमित, और भेदभाव से पीड़ित होती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर आधारित यह समाज, पुत्र के जन्म पर खुशियां मनाता है और पुत्री को भार स्वरूप समझता है। भारतीय और एशियाई समाजों में इसके गंभीर रूप देखने को मिलते हैं। बालविवाह, शती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, तिहरा तलाक, बहु विवाह, आदि जैसी प्रथाएं स्त्री के शोषण, भेदभाव एवं उनके प्रति क्रूरता के मूल कारक हैं।

भावनात्मक

 स्त्री के प्रति शोषण अथवा भेदभाव की बात करते वक्त ज्यादातर लेखक एवं विचारक आर्थिक और सामाजिक पक्ष पर ही केन्द्रित रहते है। जबकि स्त्री का एवं उसके प्रति भावनात्मक पक्ष भी भेदभाव बरतने का एक तरीका हो सकता है। भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव या शोषण तब होता है जब हम अपने शब्दों या व्यव्हार के माध्यम से स्त्री को आहात करे या उनके ह्रदय को ठेस पहुंचाएं। उदाहरण के लिये स्त्री को ताने मरना, उसकी सुंदरता को लेकर मज़ाक उड़ाना, उसकी जाती, लिंग, या उम्र आदि व्यक्तिगत बातों को लेकर मज़ाक उड़ाना, या उसकी उपेक्षा करना आदि बहुत से रास्ते हैं जिसके द्वारा भावनात्मक रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव को विचार में ला सकते हैं।

मानसिक

हमारे समाज ने व्यवहार की ऐसी संस्कृति और परम्परा विकसित कर ली है जिसके माध्यम से मन के तल पर स्त्री को ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण देते है जिससे की वह पितृसत्तात्मक समाज का एक उपकरण मात्र बन कर रह जाय। जिससे की वह पुरुष की सत्ता को कभी चुनौती न दे पाए। हमारे समाज ने स्त्री की गुलामी को सुनिश्चित करने के हर संभव तरीके ईजाद कर रखे है।

आर्थिक निर्भरता 

स्त्री को आर्थिक रूप से निर्बल रखा गया है ताकि वह पुरुष से कमजोर ही रहे और पुरुष का उस पर पकड़ बना रहे। यही कारण है कि हमारा समाज आर्थिक क्षेत्र में पुरुष को प्रेरित करता है जबकि महिला को हतोत्साहित करता है। विकसित देशों में महिलाओं का कामकाजी होना स्वीकार्य है।  परन्तु भारतीय, एशियाई, और अरब समाजों में नौकरी आदि में कामकाजी महिलाओं को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण 

पुरुष ने हमेशा से ही महिलाओं को अपने अधीन रखना चाहा है. उसको एक संपत्ति मानकर  उसका स्वामी बनना चाह है. स्त्री को नियंत्रित कर उस पर स्वामित्व स्थापित करने का दृष्टिकोण  ही प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण कहलाता है। जब तक यह दृष्टिकोण बना रहेगा तब तक समाज में स्त्रियों से भेदभाव जारी रहेगा। वैश्विक चुनौतियों के इस युग में महिलाओं का पेशेवर होना, आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बराबरी का अवसर दिया जाना यह समय की मांग है। परंतु पितृसत्तात्मक समाज का प्रभुत्वमूलक दृष्टिकोण स्त्री को यह स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं है।

नैतिक बंधन– 

स्त्री के ऊपर अनेक प्रकार के नैतिक बंधनों की बेड़ियाँ डाल दी जाती है। जबकि पुरुष स्त्री के अपेक्षा ज्यादा स्वतंत्र होते हैं। उदाहरण के लिए मुस्लिम समाजों में बहु विवाह और तिहरा तलाक की प्रथा ही ले लें। स्त्री के लिए पर्दा प्रथा अनिवार्य है। स्त्री को पूरा शरीर ढक कर रखना होगा चाहे गर्मी कितनी भी क्यों न हो। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जिसके द्वारा स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि स्त्री के ऊपर अत्यधिक नैतिक बाध्यताएं आरोपित हैं। जबकि पुरुष को अत्यधिक स्वतंत्रता प्राप्त है।

भेदभाव के कारण महिलाओं को होने वाली परेशानियां

आज विश्व में नारीवाद और उसके संरक्षण के आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में तीव्र प्रसार हो रहा है। बावजूद इसके स्त्रियों के भाग्य का निर्णय अभी भी उसके पति और परिवार के हांथों में है।वे अपने व्यवहार, विवाह, परिवार, यौन सम्बन्ध तथा अन्य बातों के सम्बन्ध में स्वतंत्र नहीं है। स्त्री अपने कार्य को कितनी भी दक्षता से क्यों न करे पुरुष उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाँथ से चूकता नहीं है। इन भेदभाव और शोषण वादी मानसिकता के कारण महिलाओं को क्रूरता, हिंसा, यौन अत्याचार, शारीरिक और मानसिक शोषण, स्वस्थ्य जनित समस्याएं, आर्थिक विपन्नता, आत्मसम्मान को ठेस, आदि परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दुनिया के हर कोने में स्त्री के प्रति हिंसा की जा रही है चाहे वह विकासशील देश हों या विकसित, या फिर तथाकथित सभ्य और संपन्न राष्ट्र हों। स्त्री के प्रति अत्याचार और भेदभाव में सब भागीदार हैं। स्त्री  को शिक्षा का सामान अवसर न दिए जाने के पीछे समाज का षड़यंत्र है की उन्हें अशिक्षित रखो तभी वह गुलाम रहेगी।

स्त्री की समस्याओं को लेकर विश्व की चिंता –

हमारा विश्व ज्यों-ज्यों आगे की तरफ बढ़ रहा है वह अपने प्राचीन रिवाजों से उबरता जा रहा है। रफ़्तार भले ही कम हो परंतु सुधारवादी प्रयास जारी है। इसी कारण से जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र के जन्म के बाद मानवाधिकारों की उद्घोषणा 1948 में आया। तब से लेकर अब तक UN लगातार मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रयास में प्रगति कर रहा है। इसी प्रयास के अन्तर्गत स्त्री के समस्याओं पर हमारे विश्व के स्थापित सरकारों ने गंभीरता दिखाई तथा स्त्री के मानवाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कदम भी उठाये गए। 25 नवम्बर को ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा मिटाओ’ का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1999 में मान्यता दी ताकि लोगों में स्त्री अधिकारों को लेकर जागरूकता पैदा किया जा सके। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र द्वारा CEDAW पारित किया गया ताकि स्त्री के प्रति सभी तरह के भेद भाव का उन्मूलन किया जा सके।

महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय

समय समय पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों की रक्षा एवं विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न नियमों एवं अभिसमयो को पारित किया गया है। इनमे से कुछ निम्न है..

  1. Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW).
  2. Optional Protocol to the Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women.
  3. Universal Declaration of Human Rights
  4. International Convention on Civil and Political Rights
  5. International Convention on Social, Economic, and Cultural Rights
  6. Committee against Torture
  7. Conventions against Torture

Convention on the Elimination of all forms of Discrimination Against Women (CEDAW)-

संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18 दिसम्बर, 1979 को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। इसके दसवीं वर्षगांठ तक 100 देशों ने इसे स्वीकार कर लिया था। 1946 में संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा एक अंग का गठन किया गया था जिसका कार्य महिलाओं के अधिकार को बढावा देना और उनकी स्थिति पर नजर रखना था। 30 वर्षों के अथक परिश्रम के फलस्वरुप इस अंग का यह महान कार्य एक अभिसमय के रूप में जन्म ले सका। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है। इस अभिसमय का मुख्य लक्ष्य स्त्री और पुरुष के बिच समानता के अधिकार, मनुष्य की गरिमा, उसके मूल्य, एवं मनुष्य के मौलिक अधिकार में विश्वास को पुनः बहाल करना है।

“CEDAW” के प्रमुख प्रावधान- 

इस अभिसमय की संरचना 6 भागों में है तथा इसमें कुल 30 अनुच्छेद हैं।

Part I (Art-1 to 6)- यह भाग भेदभाव के निराकरण, सेक्स रुढीता और सेक्स के अवैध व्यापर पर केन्द्रित है।

Part II (Art 7to 9)- यह भाग महिलाओं के लिए राजनैतिक, सार्वजानिक क्षेत्र, प्रतिनिधित्व, और राष्ट्रीयता के मामले में अधिकारों की रुपरेखा प्रस्तुत करती है।

Part III (Art 10 to 14)- यह भाग स्त्री के सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों जैसे की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थय आदि पर केंद्रित है। यह भाग ग्रामीण महिलाओं के संरक्षण पर विशेष ध्यान देती है।

Part IV (Art 15 & 16)- विवाह एवं पारिवारिक जीवन में कानून की नजरों में समानता के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है।

Part V (Art 17 to 22)- राज्य पक्षकारों के रिपोर्टिंग की प्रक्रिया के सम्बन्ध में नियम के साथ-साथ एक समिति का भी गठन किया गया है जो महिलाओं के प्रति भेदभाव के उन्मूलन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उठाएगी।

Part VI (Art 23 to 30)- इस भाग में अभिसमय का अन्य संधियों पर क्या प्रभाव होगा तथा इसका राज्य पक्षकार और उसके प्रशासन पर क्या प्रभाव होगा इसके बारे में उल्लेख किया गया है।

“CEDAW” के तहत महिला अधिकार से संबंधित प्रावधान

CEDAW के Part I से लेकर Part IV ( Art. 1 से Art.16 तक ) महिला अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान दिए कए है जोकि निम्न प्रकार से है।

Art 1 – स्त्री के प्रति भेदभाव को परिभाषित किया गया है।

Art 2- इस अनुच्छेद के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है की अनुमोदन करने वाले पक्षकार यह सुनिश्चित करेंगे की उनके घरेलु कानून में लैंगिक समानता स्थापित हो तथा उनके कानूनों में से भेदभावपूर्ण प्रावधान निरस्त हो। महिलाओं के लिए ट्रिब्यूनल की स्थापना किया जाये। उनके खिलाफ भेदभाव मिटाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु समुचित कदम उठाया जाय।

Art 3- राजनैतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के स्त्री-पुरुष में समानता के आधार पर मानवाधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 4- मातृत्व के लिए विशेष सुरक्षा भेदभाव के अंतर्गत प्रगणित नहीं होगा।

Art 5- बच्चों की  परवरिश में स्त्री एवं पुरुष की समान जिम्मेदारी को निर्धारित अथवा मान्यता दिया जाय।

Art 6- राज्य पक्षकार महिलाओं की तस्करी, वेश्यावृति, और शोषण के सभी रूपों के उन्मूलन के लिए समुचित उपाय करें।

Art 7- राजनैतिक और सामाजिक जीवन में मतदान तथा सरकार में भागीदारी हेतु समानता के अधिकार की गारन्टी सुनिश्चित किया जाय साथ ही गैर सरकारी संगठनों एवं संघों में भी उनके समानता के अधिकार को गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 8- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सरकार का प्रतिनिधित्व करने और अंतराष्ट्रीय संगठनों में काम करने हेतु अवसर उपलब्ध कराने की गारन्टी प्रदान करना।

Art 9- राज्य पक्षकार महिलाओ को अपने और अपने बच्चों की राष्ट्रीयता को प्राप्त करने, बदलने, और बनाये रखने में पुरुष के बराबर अधिकार प्रदान करने हेतु बाध्य होंगे।

Art 10- महिला छात्रों को भी शिक्षा का समान अवसर प्राप्त होगा तथा सहशिक्षा को बढ़ावा दिया जायेगा। खेल, छात्रवृति, और अनुदान में स्त्री को बढ़ावा दिया जायेगा।

Art 11- इस अनुच्छेद के अंतर्गत स्त्री को समान कार्य के लिए समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, अवकाश और मातृत्व अवकाश का अधिकार प्रदान किया गया है। मातृत्व, गर्भावस्था या विवाह की स्थिति में बर्खास्तगी को निषिद्ध किया गया है।

Art 12- राज्य पक्षकार का यह दायित्व है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं से सम्बंधित सभी तरह के भेदभाव का उन्मूलन किया जाय। महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ परिवार नियोजन से सम्बंधित उचित कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार को सौपा गया है।

Art 13- स्त्री के आर्थिक व सामाजिक जीवन विशेषकर पारिवारिक लाभ, बैंक, ऋण, बंधक, वितीय ऋण, खेल, मनोरंजन गतिविधियों सहित सभी क्षेत्र में समानता के अधिकार की गारंटी प्रदान किया जाय।

Art 14- यह अनुच्छेद ग्रामीण महिलाओं और उनके समस्याओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। विकास कार्यक्रमों में भाग लेने, सभी सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सा लेने, स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा का उपयोग, कृषि ऋण का उपयोग आदि सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का दायित्व राज्य पक्षकार पर होने का प्रावधान इस अनुच्छेद के अन्तर्गत किया गया है।

Art 15- विधि के समक्ष पुरुष के बराबर समानता का अधिकार, संचरण एवं निवास का अधिकार प्रदान किया जायेगा।

Art 16- विवाह और परिवार से सम्बंधित सभी मामलों में भेदभाव का उन्मूलन, पति चुनने का अधिकार, परिवार का नाम चुनने का अधिकार, बच्चों की संख्या तय करने का अधिकार, आदि प्रदान किया गया है।

आलोचनात्मक समीक्षा

इस अभिसमय की आलोचना भी किया जा सकता है जैसे यह अभिसमय एक दन्त विहीन अभिसमय है जिसके पास अनुशास्ति की शक्ति नहीं है और न ही विभिन्न राज्यों के बीच कोई सामंजस्य स्थापित करने की बात करता है।

सबसे बड़ी कमी इस अभिसमय की यह है कि यह अभिसमय महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के समस्या के समाधान संबंधित नियम को तो उल्लेखित करता है। लेकिन इस अभिसमय के सदस्य के रुप मे किसी महिला सदस्य की बात नहीं करता है।

इस अभिसमय के अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि इस समिति के सदस्य उच्च नैतिक हैसियत एवं क्षमता वाले होंगे। इसमें उच्च नैतिक हैसियत को परिभाषित नहीं किया गया है।

Civil और Political Convention के प्रावधान से इस अभिसमय की एक खामी और है यह अभिसमय मानवाधिकार समिति से भी कमजोर समिति का निर्माण करता है क्यूंकि इसमें राज्यों के मध्य संवाद स्थापित करने की बात नहीं कही गई है।

इस अभिसमय की एक और तरीके से भी आलोचना की जा सकती है।—

विश्व में बहुत से ऐसे देश है जहाँ महिलाओं को कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है अगर कुछ अधिकार दिए भिगाए है तो वह अत्यंत सिमित है। यह अभिसमय ऐसे राज्यों के लिए कोई भी बाध्यकारी उपबन्ध नहीं कर पाया है।

यह अभिसमय महिलाओं के लिए समान दर्जा की बात तो करता है परन्तु विश्व के बहुत से ऐसे राष्ट्र है जहाँ की महिलाओं को यह पता ही नहीं है कि उन्हें सम्पति या अन्य सामुदायिक मसले में क़ानूनी रूप अधिकार मिला है। यह अभिसमय ऐसी महिलाओं के लिए कोई सुझाव नहीं देता है।

मूल्यांकन

जैसा की  हम जानते है संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 18  दिसम्बर, 1979  को “CEDAW” स्वीकार किया गया। यह 20 देशों के अनुमोदन के बाद 3 सितंबर 1981 को प्रभाव में आया। समय के साथ साथ इसके सदस्य देशों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती गई और इसका विस्तार कई देशों में हो गया। महिलाओं की उन्नति के लिए इस अभिसमय में कई प्रावधान है जिससे उनको समाज मे बराबरी का दर्जा प्राप्त हो सके एवं उनके साथ हो रहे भेदभाव को कम किया जा सके।

परन्तु वास्तविकता यह है कि आज के वैश्विक समाज में कोई भी किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून को बिना प्रयाप्त बाध्यकारी उपबन्ध के सामान रूप से लागु कर पाना बहुत ही मुश्किल है। “CEDAW” की स्थिति भी ऐसी ही है.यह अभिसमय भी कई प्रकार की कमियों से युक्त है जो इसके पूर्ण रूप से लागु होने में बाधक है। इसप्रकार यह अभिसमय आजके समय में उतना प्रभावी नहीं है जितना इसके गठन करते समय अपेक्षा की गई थी।

लेकिन इन सबके बावजूद भी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के बीच इस अभिसमय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यह अभिसमय पूरी मानवजाति का ध्यान स्त्री और उसके अधिकारों के हनन की चिंताओं की ओर आकर्षित करता है।

 

 

फ़ासले..(Fasale)

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मैंने देखा अज़ीब सी घटना,

जो थी बहुत खास  ।

मानव खा रहे  थे मांस,

व कुत्ते खा रहे  थे घास   ।।

उनके घर के बचे भोजन से ,

आज भी आ रही थी बांस  ।

मेरे घर के बच्चों को छोड़ो ,

चूहें भी है उदास  ।।

वहां होती अतिवृष्टि  से

जीवन त्रास- त्रास   ।

यहाँ फूटी अंख दृष्टि भी-

तक रही आकाश ।।

उनके जनम दिन पर आज-

लुटाये जा रहे वस्त्र खासम – खास   ।

इनके मरण दिन पर आज –

एक कफ़न के लिए भी तरस रही है लाश ।।

 

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                     तनहा ही रह गया 

 

Fasale Hindi Poem

मनुष्य और अध्यात्म-Human and Spirituality

मनुष्य और अध्यात्म-Human and Spirituality

मनुष्य  की चेतना एक कैद में, एक स्वप्न जाल में उलझी हुयी है । उसे संदेह तो  होता है परन्तु मन के द्वारा बुने गए माया जाल में उलझकर भविष्य की आशा और उम्मीदों में इसे नजर अंदाज कर देता है । हम सभी के जीवन में वो क्षण कभी न कभी आता है की वह स्वयं से पूछ बैठता है की आखिर हम जी क्यों रहे है? हमे क्या चाहिए? हमारी मंजिल कहा है? हम कहा से आये हैं ? एक दिन कहाँ खो जायेंगे ?

ये ऐसे प्रश्न हैं जो सभ्यता के आदि से मनुष्य के अंतर्मन में उठता रहा है की सत्य  क्या है ? जीवन या मृत्यु ! शाश्वत क्या है ? अँधेरा या प्रकाश ! मनुष्य सुख ढूंढता है परन्तु अंततः दुःख ही क्यों प्राप्त करता है ? क्या नित्य है ? सुख या दुःख !

harmony

वास्तव में ऐसे प्रश्न एक विचारशील, मननशील मनुष्य के अंतर्मन में उठता ही रहा है । परन्तु आरम्भ से ही भूल इन प्रश्नों में ही छिपा है। क्योंकि ये प्रश्न ही गलत है । सत्य क्या है ? लोग सोचते हैं की या तो जीवन सत्य होगा या फिर मृत्यु ! दोनों एक साथ सत्य कैसे हो सकते है ? या तो हम अविनाशी है या मरणशील । भौतिकवादी कहते है की यही जीवन सबकुछ है इस जीवन के आलावा कोई जीवन नहीं। अध्यात्मवादी या धार्मिक लोग विश्वास करते है की मृत्यु एक भ्रम है जब हम मरते है तो भी मर नहीं जाती किसी और रूप में हमारा अस्तित्व होता है।

मेरा कहना है की ये दोनों ही गलत है। सवाल केवल एक के सत्य होने का नहीं है दोनों ही एक साथ सत्य है। सत्य इतना विराट  है की वो सभी प्रकार के विरोधाभास को अपने अन्दर समाहित कर लेता है।  सवाल किसी एक के सत्य होने का जिद पाल लेने की नहीं है। सवाल है अंतर्दृष्टि जागृत करने का, मूल प्रश्न स्वयं से यह पूछना चाहिए की क्या हमारे पास वो अंतर्दृष्टि है जिससे हम समग्र का दर्शन कर सके। जब हम अन्तरदृष्टि पाने के प्रश्न पर सहमत होते है तब वहीँ से वास्तव में अध्यात्मिक यात्रा की राह प्रारम्भ होती हैं।

जब हम अपने अन्दर होश का वो दिया जलाने को तत्पर होते है जिससे सत्य का, समग्र का दर्शन संभव हो सके तब हम दर्शनशास्त्र के वाद विवाद या किसी सिद्धांत अथवा मत के खंडन मंडन के पचरे में न परकर हम उस विधि की तलाश में निकलतें हैं जिससे सत्य तक पहुंच पाना सभव हो सके ।

एक बार जब हम अपने होश या ध्यान को साधने के लिए वादविवाद के व्यह्मोह से हटकर विधि में रूचि रखने लगते है तब समझते है कि जीवन में वास्तविक शिष्यत्व का जन्म हुआ है। अब गुरु शिष्य को विधि देने को तैयार होता है और शिष्य उसे ग्रहण करने को।  इससे पहले की सारी बाते तैयारीयां भर होती हैं….. केवल भूमिका भर होती है।

monk

अगर विधि की बात करें तो विधि तो हजारों है जिनसे से होश को साधा जा सकता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की जितने मनुष्य है उतनी विधियां हो सकती हैं। क्यों की हर मनुष्य अपने आप में अलग और अद्वितीय है। किसी दुसरे की विदि किसी और के काम आ जाये यह हमेसा संभव नहीं। इसलिए अध्यात्मिक यात्री को हमेसा एक मार्गदर्शक, एक ऐसे सहयात्री की जरुरत होती है जो जानता है, जो पहुंचा है, जिसने सत्य को देखा है, जिया है।  परन्तु अध्यात्मिक पथ के यात्री को इसकी चिंता करने की जरुरत नहीं जब तुम तैयार होते हो तो गुरु आ ही जाते हैं।

कई प्रचलित विधि जैसे- विपश्ना, ध्यान योग, तंत्र, आदि की चर्चा हम आगे करेंगे साथ ही इन मार्गो पे चलने के फायदे और बरतने वाली सावधानियों पर भी चर्चा करेंगे।

 

माँ का आंचल

 

जब आंख खुली तो अम्‍मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था

उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था

हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया

मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी

उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था

मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी

मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्‍या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है

जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं

मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है

मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है

हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है

मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है

मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्‍य की काया है

मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्‍तों की गहराई है

मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्‍यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है

मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है

माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है

मां सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है

अम्‍मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है

सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं

हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं…

 

maa ka anchal

तनहा ही रह गया

lonely

न मैं स्मार्ट बनने की कोशिश करता हूँ,

और न ही मैं परियों पे मरता हूँ।

वो एक भोली सी लड़की है,

जिसे मैं मोहब्बत करता हूँ।

उसकी तस्वीर मेरी दिलों दिमाग व आखों में बसी है,

मगर ‘हाय’ वो किसी और को दिल दे चुकी है।

अब एक ही बात मुझे खटकती है हर रोज़,

बिना उसके अतीत जाने मैंने उसे आखिर किया ही था क्यों प्रपोज।

लगने से पहले ही उजड़ गई

ये प्यार वाली बगिया,

इस संसार की भरी महफ़िल में

आखिर तनहा ही रह गया ” बेचारा रबिया” ।।

tanaha hi rah gaya

हमारी ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी में छिपी हुई है

एक बार पचास लोगों का ग्रुप। किसी मीटिंग में हिस्सा ले रहा था।
मीटिंग शुरू हुए अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि स्पीकर अचानक
ही रुका और सभी पार्टिसिपेंट्स को गुब्बारे देते हुए बोला , ” आप
सभी को गुब्बारे पर इस मार्कर से अपना नाम लिखना है। ” सभी ने
ऐसा ही किया।team

अब गुब्बारों को एक दुसरे कमरे में रख दिया गया।
स्पीकर ने अब सभी को एक साथ कमरे में जाकर पांच मिनट के अंदर
अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने के लिए कहा।

सारे पार्टिसिपेंट्स
तेजी से रूम में घुसे और पागलों की तरह अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने
लगे।

पर इस अफरा-तफरी में किसी को भी अपने नाम
वाला गुब्बारा नहीं मिल पा रहा था…

5 पांच मिनट बाद सभी को बाहर
बुला लिया गया।

स्पीकर बोला , ” अरे! क्या हुआ , आप
सभी खाली हाथ क्यों हैं ? क्या किसी को अपने नाम
वाला गुब्बारा नहीं मिला ?” ”

नहीं ! हमने बहुत ढूंढा पर
हमेशा किसी और के नाम का ही गुब्बारा हाथ आया…”, एक
पार्टिसिपेंट कुछ मायूस होते हुए बोला।

“कोई बात नहीं , आप लोग एक
बार फिर कमरे में जाइये , पर इस बार जिसे जो भी गुब्बारा मिले उसे
अपने हाथ में ले और उस व्यक्ति को दे दे जिसका नाम उसपर
लिखा हुआ है ।  स्पीकर ने निर्दश दिया।

एक बार फिर सभी पार्टिसिपेंट्स कमरे में गए, पर इस बार सब शांत थे , और कमरे
में किसी तरह की अफरा- तफरी नहीं मची हुई थी। सभी ने एक दुसरे
को उनके नाम के गुब्बारे दिए और तीन मिनट में ही बाहर निकले आये।

स्पीकर ने गम्भीर होते हुए कहा ,

बिलकुल यही चीज हमारे जीवन में भी हो रही है।
हर कोई अपने लिए ही जी रहा है , उसे इससे कोई
मतलब नहीं कि वह किस तरह औरों की मदद कर सकता है , वह तो बस पागलों की तरह अपनी ही खुशियां ढूंढ रहा है , पर बहुत ढूंढने के बाद
भी उसे कुछ नहीं मिलता ,

हमारी ख़ुशी (Hamari Khushi)दूसरों की ख़ुशी में छिपी हुई है।

जब हम औरों को उनकी खुशियां देना सीख जायेंगे
तो अपने आप ही हमें हमारी खुशियां मिल जाएँगी।
और यही मानव-
जीवन का उद्देश्य भी है

 

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Struggle

नई पीढ़ी के लिए, जो हर काम के लिए संघर्ष कर रहे है।

एक बार एक युवक को संघर्ष करते – करते कई वर्ष हो गए लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। वह काफी निराश हो गया, और नकारात्मक विचारो ने उसे घेर लिया। उसने इस कदर उम्मीद खो दी कि उसने आत्महत्या करने का मन बना लिया।

वह जंगल में गया और वह आत्महत्या करने ही जा रहा था कि अचानक एक सन्त ने उसे देख लिया।Struggle

सन्त ने उससे कहा – बच्चे क्या बात है , तुम इस घनघोर जंगल में क्या कर रहे हो?

उस युवक ने जवाब दिया – मैं जीवन में संघर्ष करते -करते थक गया हूँ और मैं आत्महत्या करके अपने बेकार जीवन को नष्ट करने आया हूँ। सन्त ने पूछा तुम कितने दिनों से संघर्ष कर रहे हों?

युवक ने कहा मुझे दो वर्ष के लगभग हो गए, मुझे ना तो कहीं नौकरी मिली है, और ना ही किसी परीक्षा में सफल हो सकां हूँ।

सन्त ने कहा– तुम्हे नौकरी भी मिल जाएगी और तुम सफल भी हो जायोगे। निराश न हो , कुछ दिन और प्रयास करो।

युवक ने कहा– मैं किसी भी काम के योग्य नहीं हूँ, अब मुझसे कुछ नहीं होगा।

जब सन्त ने देखा कि युवक बिलकुल हिम्मत हार चुका है तो उन्होंने उसे एक कहानी सुनाई।

“एक बार ईश्वर ने दो पौधे लगाये , एक बांस का, और एक फर्न (पत्तियों वाला) का।

फर्न वाले पौधे में तो कुछ ही दिनों में पत्तियाँ निकल आई। और फर्न का पौधा एक साल में काफी बढ़ गया पर बाँस के पौधे में साल भर में कुछ नहीं हुआ।

लेकिन ईश्वर निराश नहीं हुआ। दूसरे वर्ष में भी बाँस के पौधे में कुछ नहीं हुआ। लेकिन फर्न का पौधा और बढ़ गया।

ईश्वर ने फिर भी निराशा नहीं दिखाई।

तीसरे वर्ष और चौथे वर्ष भी बाँस का पौधा वैसा ही रहा, लेकिन फर्न का पौधा और बड़ा हो गया।

ईश्वर फिर भी निराश नहीं हुआ।

फिर कुछ दिनों बाद बाँस के पौधे में अंकुर फूटे और देखते – देखते कुछ ही दिनों में बाँस का पेड़ काफी ऊँचा हो गया।

बाँस के पेड़ को अपनी जड़ों को मजबूत करने में चार पाँच साल लग गए।

सन्त ने युवक से कहा – कि यह आपका संघर्ष का समय, अपनी जड़ें मजबूत करने का समय है। आप इस समय को व्यर्थ नहीं समझे एवं निराश न हो।  जैसे ही आपकी जड़ें मजबूत ,परिपक्व हो जाएँगी, आपकी सारी समस्याओं का निदान हो जायेगा। आप खूब फलेंगे, फूलेंगे, सफल होंगें और आकाश की ऊँचाइयों को छूएंगें।

आप स्वंय की तुलना अन्य लोगों से न करें। आत्मविश्वास नहीं खोएं। समय आने पर आप बाँस के पेड़ की तरह बहुत ऊँचे हो जाओगे। सफलता की बुलंदियों पर पहुंचोगे।
बात युवक के समझ में आ गई और वह पुन : संघर्ष के पथ पर चल दिया।

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                            भाग्य से ज्यादा और समय से पहले न किसी को कुछ मिला है और न मीलेगा।

दोस्तों, फर्न के पौधे की जड़ें बहुत कमज़ोर होती हैं जो जरा सी तेज़ हवा से ही जड़ से उखड जाता है। और बाँस के पेड़ की जड़ें इतनी मजबूत होती हैं कि बड़ा सा बड़ा तूफ़ान भी उसे नहीं हिला सकता। इसलिए दोस्तों संघर्ष से घबराये नहीं। मेहनत करते रहें और अपनी जड़ों को इतनी मजबूत बना लें कि बड़े से बड़ी मुसीबत, मुश्किल से मुश्किल हालात आपके इरादो को कमजोर ना कर सके और आपको आगे बढ़ने से रोक ना सके। किसी से भी अपनी तुलना ना करे , सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्‍य की और बढ़ते रहे। आप जरूर सफल होंगे और आसमान की बुलंदियों को छुयेंगें।

भाग्य से ज्यादा और समय से पहले न किसी को कुछ मिला है और न मीलेगा

luck

एक सेठ जी थे । जिनके पास काफी दौलत थी। सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी।
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया।
जिससे सब धन समाप्त हो गया।

बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो?

सेठ जी कहते कि

“जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जायेंगे।”

luck

एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी उनका दामाद घर आ गया।
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख दी जाये।

यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये।

दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिये जायें ।  दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया।

उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे।

मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ जी को वापिस बेच दिया।

सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा पीट लिया।
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की बात कह डाली।

सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जागा।

देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी और न ही मिठाई वाले के भाग्य में।

इसलिये कहते हैं कि

“भाग्य से ज्यादा  और समय से पहले न किसी को कुछ मिला है और न मीलेगा।”

इसीलिए  ईश्वर जितना दे उसी मै संतोष करो…
झूला जितना पीछे जाता है, उतना ही आगे आता है। एकदम बराबर।
सुख और दुख दोनों ही जीवन में बराबर आते हैं।

जिंदगी का झूला पीछे जाए, तो डरो मत, वह आगे भी आएगा।

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